Chhattisgarh: बालोद। कहते हैं लोकतंत्र का चौथा स्तंभ पत्रकारिता है, लेकिन जब चौथे स्तंभ का ही बिल लंबित हो जाए तो फिर खबरें भी शायद सोचने लगती हैं कि आखिर हम छपें तो छपें कैसे? बालोद जिला कलेक्ट्रेट परिसर में लगा एक सूचना पत्र इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। सूचना पढ़कर पत्रकारों के चेहरे पर मुस्कान भी है और माथे पर चिंता की लकीरें भी।
सूचना में साफ-साफ लिखा गया है कि जिला विपणन कार्यालय के कक्ष क्रमांक 88, 89, 90 और 91 में कृपया न्यूज़ पेपर न दें, क्योंकि बजट मद में राशि आबंटित नहीं होने के कारण भुगतान किया जाना संभव नहीं है। यानी खबरें तो चाहिए, लेकिन फिलहाल उनके भुगतान के लिए सरकारी खजाने ने ‘मौन व्रत’ धारण कर लिया है।
अब सवाल यह उठता है कि जब बजट ही नहीं है तो सुबह-सुबह चाय के साथ खबरों का स्वाद कौन लेगा? अखबार वाले भी सोच में हैं कि खबर पहुंचाएं या फिर पहले बजट आने का इंतजार करें। ऐसा लग रहा है मानो सरकारी दफ्तर कह रहा हो- “अखबार वाले भैया! खबरें थोड़े दिन अपने पास ही संभालकर रखिए, जब खजाना मुस्कुराएगा तब हम भी मुस्कुरा देंगे।”
पत्रकारों के बीच इस सूचना को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। कोई इसे सरकारी खजाने की बदहाली बता रहा है तो कोई मजाकिया अंदाज में कह रहा है कि अब सरकारी कार्यालयों में भी ‘नो क्रेडिट, ओनली कैश’ का बोर्ड लगने लगा है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां बोर्ड कुछ यूं है- “नो बजट, नो न्यूज़ पेपर!”
सोचने वाली बात यह भी है कि सरकारी योजनाओं और उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने में समाचार पत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। लेकिन जब उन्हीं समाचार पत्रों के भुगतान के लिए बजट नहीं होगा तो फिर सूचना तंत्र की गाड़ी आखिर चलेगी कैसे?
फिलहाल जिला विपणन कार्यालय की यह सूचना सोशल मीडिया में जमकर वायरल हो रही है और लोग चुटकी लेते हुए कह रहे हैं- “लगता है खबरों पर भी महंगाई की मार पड़ गई है।”












Leave a Reply