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शनि. मई 16th, 2026

मदर्स डे स्पेशल: माँ की ममता को लकड़ी में उकेरने वाले शिल्पी, एक ही लकड़ी से गढ़ दी माँ-बेटे के प्रेम की जीवंत कहानी

माँ… केवल एक शब्द नहीं, बल्कि वह एहसास है जिसमें संसार की सारी ममता, त्याग, स्नेह और अपनापन समाया होता है। बच्चे की पहली मुस्कान से लेकर उसके हर दर्द तक, माँ अपने जीवन का हर पल अपने बच्चे के नाम कर देती है। इसी निश्छल प्रेम और अटूट रिश्ते को छत्तीसगढ़ के भिलाई नगर के मशहूर काष्ठ शिल्पी श्रवण चोपकर ने अपनी अद्भुत कला के माध्यम से लकड़ी में जीवंत कर दिया है।

इस्पात नगरी भिलाई के सेक्टर-02 निवासी 84 वर्षीय श्रवण चोपकर ने मदर्स डे के अवसर पर शीशम की एक ही लकड़ी से ऐसा अनोखा शिल्प तैयार किया है, जिसे देखकर हर किसी की आंखों में माँ के प्रति सम्मान और भावनाओं की लहर दौड़ जाती है। यह सिर्फ एक लकड़ी की मूर्ति नहीं, बल्कि माँ और बच्चे के बीच के उस पवित्र रिश्ते की कहानी है, जो जन्म से लेकर जीवनभर सांसों की तरह साथ चलता है।

करीब 18 इंच लंबी, 8 इंच चौड़ी और डेढ़ इंच मोटी शीशम की लकड़ी को ढाई महीने की अथक मेहनत और बारीक कारीगरी से तराशकर श्रवण चोपकर ने “ममता की मूरत” का रूप दिया है। इस अद्भुत कृति की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें कहीं भी किसी प्रकार का जोड़, कील या फेविकोल का इस्तेमाल नहीं किया गया है। पूरी कलाकृति एक ही लकड़ी के टुकड़े से बनाई गई है, जिसमें माँ और बच्चे के वात्सल्य भरे नौ अलग-अलग रूपों को मूवमेंट के जरिए दर्शाया गया है।

इस कलाकृति में माँ द्वारा बच्चे को नहलाना, सिर पर पानी डालना, गोद में झुलाना, खाना खिलाना और अपने आंचल में सहेज लेना जैसे दृश्य इतने जीवंत लगते हैं, मानो लकड़ी नहीं बल्कि ममता खुद सांस ले रही हो। हर आकृति में माँ के चेहरे का स्नेह और बच्चे की मासूमियत साफ दिखाई देती है। शिल्प को देखकर ऐसा महसूस होता है जैसे माँ का प्यार समय और शब्दों से कहीं बड़ा होता है।

श्रवण चोपकर ने इस शिल्प में “चेन कटिंग” तकनीक का उपयोग करते हुए माँ की चोटी को विशेष रूप दिया है, जो उनकी कला की अलग पहचान बन चुकी है। लकड़ी के भीतर इतनी महीन कटिंग और मूवमेंट देना तकनीकी रूप से बेहद कठिन माना जाता है, लेकिन दशकों के अनुभव और कला के प्रति समर्पण ने उनकी इस रचना को अद्वितीय बना दिया।

श्रवण चोपकर बताते हैं कि उनका उद्देश्य केवल एक कलाकृति बनाना नहीं था, बल्कि छत्तीसगढ़ की उस संस्कृति और पारिवारिक भावनाओं को दुनिया के सामने लाना था, जहां माँ और बच्चे का रिश्ता सबसे पवित्र माना जाता है। उनका कहना है कि आज के आधुनिक दौर में भी माँ की ममता और संस्कार ही परिवार को जोड़े रखते हैं, और यही संदेश वह अपनी कला के माध्यम से देना चाहते हैं।

काष्ठ कला के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना चुके श्रवण चोपकर का नाम वर्ष 2012 में Limca Book of Records और India Book of Records में भी दर्ज हो चुका है। उनकी कलाकृतियां केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि देशभर में सराही जाती रही हैं।

मदर्स डे पर तैयार की गई यह अनूठी कृति आज लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। जो भी इस शिल्प को देखता है, वह कुछ क्षणों के लिए अपनी माँ की यादों में खो जाता है। यह कला केवल लकड़ी की नक्काशी नहीं, बल्कि उस भावना की अभिव्यक्ति है, जिसे शब्दों में पूरी तरह बयां नहीं किया जा सकता — माँ की ममता।

CRIME: एंबुलेंस में मरीज की जगह गांजा मिलते ही पुलिस ने किया तगड़ा ऑपरेशन.?

महासमुंद जिले में पुलिस ने गांजा तस्करी के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए एंबुलेंस की आड़ में चल रहे अंतरराज्यीय ड्रग नेटवर्क का पर्दाफाश किया है। एंटी नारकोटिक टास्क फोर्स और कोमाखान थाना पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में करीब 38 लाख 50 हजार रुपये कीमत का 77 किलो गांजा जब्त किया गया है।

 

बताया जा रहा है कि तस्कर एंबुलेंस का इस्तेमाल कर गांजा की खेप को एक राज्य से दूसरे राज्य तक पहुंचा रहे थे ताकि पुलिस और जांच एजेंसियों को शक न हो। मामले में पुलिस ने महाराष्ट्र के 5 अंतरराज्यीय तस्करों को गिरफ्तार किया है।

 

पुलिस के मुताबिक आरोपी उड़ीसा से गांजा लेकर महाराष्ट्र के सोलापुर की ओर जा रहे थे। इसी दौरान कोमाखान थाना क्षेत्र में मुखबिर से मिली सूचना के आधार पर पुलिस ने घेराबंदी कर कार्रवाई की। जांच के दौरान एंबुलेंस से भारी मात्रा में गांजा बरामद हुआ।

 

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि तस्करी के इस नेटवर्क में सिर्फ एंबुलेंस ही नहीं, बल्कि एक पायलेटिंग कार का भी इस्तेमाल किया जा रहा था। आशंका जताई जा रही है कि पायलेटिंग कार आगे चलकर रास्ते की निगरानी करती थी और पुलिस चेकिंग की जानकारी पीछे चल रही एंबुलेंस तक पहुंचाती थी।

 

कार्रवाई के दौरान पुलिस ने गांजा परिवहन में इस्तेमाल एंबुलेंस, पायलेटिंग कार और 5 मोबाइल फोन समेत करीब 50 लाख 45 हजार रुपये की संपत्ति जब्त की है। इस कार्रवाई को जिले में मादक पदार्थ तस्करी के खिलाफ बड़ी सफलता माना जा रहा है।

 

एंटी नारकोटिक टास्क फोर्स और महासमुंद पुलिस की इस संयुक्त कार्रवाई के बाद अब कई और खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है। पूरा मामला कोमाखान थाना क्षेत्र का बताया जा रहा है, जहां पुलिस आगे की कानूनी कार्रवाई में जुटी हुई है।

 

 

BALOD: “11 निजी स्कूलों को नोटिस, लेकिन सरकारी स्कूलों पर चुप्पी क्यों?

बालोद। जिले में 10वीं और 12वीं बोर्ड परीक्षा के खराब परिणामों के बाद 11 निजी स्कूलों को कारण बताओ नोटिस जारी किए जाने की कार्रवाई अब सवालों के घेरे में आ गई है। जहां एक ओर निजी स्कूलों पर सख्ती दिखाई गई है, किन्तु सरकारी स्कूलों का क्या.? दोहरे मापदंड के आरोप लगने लगे हैं।

जिले में इस वर्ष परीक्षा परिणाम बेहद निराशाजनक रहे हैं।
इतना ही नहीं, करीब 13 साल बाद पहली बार बालोद जिला 10वीं और 12वीं की टॉप-10 मेरिट सूची से बाहर हो गया है, जिसे जिले के लिए बड़ा शैक्षणिक झटका माना जा रहा है।

इन खराब परिणामों के बाद जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) द्वारा 11 निजी स्कूलों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया गया है। नोटिस में संबंधित स्कूल प्रबंधन से कमजोर परिणामों का कारण पूछते हुए भविष्य में सुधार के लिए ठोस योजना प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर मान्यता समाप्त करने तक की चेतावनी भी दी गई है।

हालांकि इस कार्रवाई के बाद अब यह सवाल उठने लगा है कि जब हजारों छात्र फेल हुए हैं, तो जिम्मेदारी केवल निजी स्कूलों की ही क्यों तय की जा रही है। अभिभावकों और स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकारी स्कूलों में भी शिक्षा की स्थिति संतोषजनक नहीं है, जहां शिक्षकों की कमी, संसाधनों का अभाव और निगरानी की कमजोर व्यवस्था जैसी समस्याएं लंबे समय से बनी हुई हैं।

निलिमा श्याम जिला स्थायी शिक्षा समिति सदस्य

जिला स्थायी शिक्षा समिति सदस्य निलिमा श्याम ने विभाग पर सवाल उठाते हुए कहा कि परीक्षा परिणाम पूरे जिले की शिक्षा व्यवस्था का प्रतिबिंब होता है, ऐसे में केवल निजी स्कूलों पर कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है। उनका कहना है कि सरकारी और निजी-दोनों प्रकार के स्कूलों की समान रूप से समीक्षा और जवाबदेही तय की जानी चाहिए।

इन निजी स्कूलों को जारी हुआ नोटिस
सर्वोदय अंग्रेजी माध्यम हाई स्कूल गुरुर, साई शिशु मंदिर गुण्डरदेही, नेताजी सुभाष चंद्र बोस विद्यालय अर्जुंदा, नेहरू विद्यालय भाठागांव, श्री राम विद्या मंदिर पैरी, गुरुकुल उच्चतर माध्यमिक विद्यापीठ बालोद, गुरुनानक विद्यालय दल्ली राजहरा, साई शिशु मंदिर दल्ली राजहरा, गांधी विद्या मंदिर दल्ली राजहरा तथा विवेकानंद हाई स्कूल डौण्डी।

इस पूरे मामले के बाद शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठने लगे हैं। यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या विभाग ने पूरे सत्र के दौरान प्रभावी मॉनिटरिंग की थी या फिर परिणाम आने के बाद ही कार्रवाई की जा रही है।

फिलहाल, जिले में शिक्षा व्यवस्था को लेकर बहस तेज हो गई है और सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या आने वाले समय में सरकारी स्कूलों की भी जवाबदेही तय की जाएगी या यह कार्रवाई केवल निजी स्कूलों तक ही सीमित रह जाएगी।

 

 

“आंधी-तूफान का कहर: 17 राज्यों में हाई अलर्ट, 70KM/h की रफ्तार से चलेंगी हवाएं!”

IED ब्लास्ट: 4 जवान शहीद, आत्मसमर्पित नक्सलियों ने दी थी इनपुट

कांकेर/नारायणपुर।
बस्तर के घने और खतरनाक जंगलों में एक बार फिर बारूद की गूंज सुनाई दी। नक्सल प्रभावित क्षेत्र में चल रहे डी-माइनिंग और सर्च ऑपरेशन के दौरान हुए भीषण आईईडी विस्फोट में चार बहादुर जवानों ने अपनी जान गंवा दी। यह हादसा थाना छोटेबेठिया क्षेत्र के अंतर्गत कांकेर और नारायणपुर जिले की सीमा पर हुआ।

शनिवार सुबह डीआरजी (District Reserve Guard) की टीम एरिया डॉमिनेशन और सर्च ऑपरेशन के लिए जंगलों की ओर रवाना हुई थी। टीम आत्मसमर्पित नक्सलियों के बताए ठिकाने पर डंप बारूद बरामद करने पहुँची थी। जवान बेहद सतर्कता के साथ आगे बढ़ रहे थे, क्योंकि उन्हें अंदेशा था कि इलाके में हर कदम पर खतरा छिपा हो सकता है।

इसी दौरान, जैसे ही टीम एक संदिग्ध स्थान पर पहुँची और वहां छिपाए गए विस्फोटक डंप को बाहर निकालने की प्रक्रिया शुरू की, तभी अचानक जोरदार विस्फोट हो गया। धमाका इतना भयानक था कि पूरा इलाका दहल उठा।

इस दर्दनाक घटना में मौके पर ही तीन जवान — इंस्पेक्टर सुखराम वट्टी, कॉन्स्टेबल कृष्णा कोमरा और कॉन्स्टेबल संजय गढ़पाले -शहीद हो गए। वहीं, गंभीर रूप से घायल कॉन्स्टेबल परमानंद कोमरा को एयरलिफ्ट कर रायपुर ले जाया जा रहा था, लेकिन रास्ते में ही उन्होंने दम तोड़ दिया।

बस्तर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक सुंदरराज पट्टिलिंगम ने बताया कि पिछले कुछ महीनों में आत्मसमर्पित माओवादियों से मिली जानकारी के आधार पर कई आईईडी बरामद कर निष्क्रिय किए गए हैं। इससे साफ है कि माओवादी अब भी बड़ी मात्रा में विस्फोटक जंगलों में छिपाकर रख रहे हैं।

यह घटना इस बात का भी संकेत है कि भले ही कई नक्सली आत्मसमर्पण कर अहम जानकारी दे रहे हैं, लेकिन जंगलों में पहले से छिपाए गए आईईडी अब भी सुरक्षा बलों के लिए बड़ा खतरा बने हुए हैं। बस्तर क्षेत्र में सुरक्षा बल लगातार ऐसे छिपे हुए बारूदी जाल को खोजकर निष्क्रिय करने में जुटे हैं।

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CG: “शहादत की मिट्टी से उठी आवाज, सुकमा ने फिर लिखा इतिहास”

सुकमा शहादत की नींव पर खड़ा हुआ नक्सल मुक्त भविष्य दोरनापाल में ‘शहीद स्मारक’ का लोकार्पण
बुरकापाल के अमर शहीदों को दी गई भावभीनी श्रद्धांजलि, डीआईजी और कलेक्टर ने वीरों के बलिदान को किया नमन

सुकमा धर्मेन्द्र सिंह/ सुकमा जिला आज नक्सलवाद के काले साये से मुक्त होकर विकास की नई इबारत लिख रहा है। इस शांति और सुरक्षा के पीछे उन वीर जवानों का सर्वोच्च बलिदान है, जिन्होंने बुरकापाल जैसे दुर्गम क्षेत्रों में राष्ट्र की एकता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। इसी कड़ी में आज शुक्रवार को 74वीं बटालियन मुख्यालय, दोरनापाल में वर्ष 2017 की बुरकापाल घटना में शहीद हुए 25 वीर जवानों की स्मृति में नवनिर्मित शहीद स्मारक का गरिमामय लोकार्पण किया गया।

सम्मान और गौरव का पल
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डीआईजी सीआरपीएफ आनंद सिंह राजपुरोहित ने विधिवत पूजा-अर्चना कर स्मारक का अनावरण किया। इस दौरान वातावरण अत्यंत भावुक और श्रद्धामय रहा। उपस्थित अधिकारियों और जवानों ने शस्त्र झुकाकर अपने वीर साथियों को सलामी दी और दो मिनट का मौन रखकर उनकी अमर स्मृति को नमन किया।

संघर्ष से शांति तक का सफर
लोकार्पण के अवसर पर वर्ष 2017 की उस हृदयविदारक घटना को याद किया गया, जब दोरनापाल-जगरगुंडा मार्ग निर्माण के दौरान नक्सलियों ने कायराना हमला किया था। अधिकारियों ने बताया कि एक समय यह क्षेत्र नक्सलवाद का गढ़ था, जहाँ सड़क बनाना किसी चुनौती से कम नहीं था।

आज अगर सुकमा नक्सल मुक्ति की दिशा में खड़ा है, तो इसका श्रेय उन जवानों को जाता है जिन्होंने जगरगुंडा मार्ग के पत्थर-पत्थर को अपने खून से सींचा है।

सुकमा कलेक्टर अमित कुमार ने इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर कहा कि सुकमा अब नक्सलवाद के दंश से मुक्त हो चुका है। उन्होंने कहा, “हमारे जवानों ने जो शहादत दी है, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। आज बुरकापाल के वीरों की याद में स्मारक का लोकार्पण कर हम उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर रहे हैं

बुरकापाल घटनास्थल पर भी दी श्रद्धांजलि
दोरनापाल में कार्यक्रम के पश्चात डीआईजी आनंद सिंह राजपुरोहित, कमांडेंट हिमांशु पांडे और कमांडेंट कुमार मयंक सीधे बुरकापाल स्थित वास्तविक घटनास्थल पर पहुँचे। वहां स्थित स्मारक पर पुष्पचक्र अर्पित कर शहीदों को याद किया गया। उपस्थित सभी जवानों ने संकल्प लिया कि वे शहीदों के आदर्शों पर चलते हुए राष्ट्र सेवा के लिए सदैव तत्पर रहेंगे।

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जहां गूंजी थीं गोलियां, अब गूंजा भारत माता की जय का नारा सम्मानः ताड़मेटला में शहीद स्मारक का लोकार्पण  

76 शहीदों की स्मृति में बना गौरव स्मारक, सीआरपीएफ डीजी ने किया उद्घाटन

नक्सलवाद के काले साये से आज़ाद हुआ सुकमा: ताड़मेटला में शहीदों की याद में बना स्मारक

 

सुकमा धर्मेन्द्र सिंह

सुकमा जिले के ताड़मेटला क्षेत्र से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो बदलते बस्तर और जीतते लोकतंत्र की कहानी बयां कर रही है। सोमवार को ताड़मेटला में उन 76 वीर जवानों की स्मृति में नवनिर्मित शहीद स्मारक का उद्घाटन किया गया, जिन्होंने 2010 के भीषण नक्सली हमले में देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था।

दहशत के केंद्र में अब ‘शौर्य’ का प्रतीक

यह वही ताड़मेटला है, जिसे कभी नक्सलियों का अभेद्य किला माना जाता था। इसी क्षेत्र के पास सुकमा के पहले कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन को नक्सलियों ने बंधक बनाकर रखा था, जिससे पूरा देश दहल उठा था। लेकिन आज स्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं।

कलेक्टर की मौजूदगी: विकास की नई दस्तक

नक्सल मुक्त होने के बाद पहली बार वर्तमान कलेक्टर अमित कुमार स्वयं इस संवेदनशील क्षेत्र में पहुँचे। उन्होंने शहीद स्मारक पर पुष्पचक्र अर्पित कर जवानों को भावभीनी श्रद्धांजलि दी

 

यह स्मारक हमारे जवानों के अदम्य साहस और ग्रामीणों के विश्वास की जीत है। सुकमा अब विकास और शांति की नई इबारत लिख रहा है।”

 

ऐतिहासिक संदर्भ: 2010 के हमले में शहीद हुए 76 जवानों को समर्पित।

सफलता: सुरक्षाबलों के निरंतर प्रयास से ताड़मेटला अब नक्सलियों के प्रभाव से मुक्त।

प्रशासनिक पहुँच: सालों बाद किसी उच्च अधिकारी का बिना किसी बड़े सैन्य तामझाम के गाँव पहुँचना क्षेत्र में लौटी शांति का प्रमाण है।

अब सुकमा की पहचान गोलियों की गूँज से नहीं, बल्कि विकास की पदचापों से हो रही है। ताड़मेटला का यह स्मारक आने वाली पीढ़ियों को जवानों की शहादत और क्षेत्र की बहादुरी की याद दिलाता रहेगा।

 

 

सुकमा जिले के ताड़मेटला इलाके में 2010 में नक्सली हमले में जान गंवाने वाले 76 सुरक्षाकर्मियों को समर्पित एक शहीद स्मारक का उद्घाटन सोमवार को किया गया। अधिकारियों ने यह जानकारी दी।इस शहीद स्मारक का लोकार्पण छत्तीसगढ़ को सशस्त्र नक्सलियों से मुक्त घोषित किए जाने के लगभग एक सप्ताह बाद किया गया है।अधिकारियों ने बताया कि यह स्मारक हमले वाली जगह के करीब, गडगडमेटा गांव में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) शिविर के नजदीक बनाया गया है। उन्होंने बताया कि सीआरपीएफ के महानिदेशक ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह, राज्य के अतिरिक्त महानिदेशक (नक्सल विरोधी अभियान) विवेकानंद सिन्हा, पुलिस महानिरीक्षक (बस्तर क्षेत्र) सुंदरराज पट्टिलिंगम और सीआरपीएफ, राज्य पुलिस तथा जिला प्रशासन के अन्य अधिकारियों ने हमले की बरसी पर शहीद जवानों को श्रद्धांजलि दी और औपचारिक रूप से इस स्मारक को जनता को समर्पित किया।सबसे

घातक सुरक्षा हमलों में से एक06 अप्रैल 2010 को तत्कालीन दंतेवाड़ा जिले (यह इलाका अब सुकमा जिले में आता है) के गडगडमेटा और ताड़मेटला गांवों के मध्य जंगलों में हुए एक नक्सली हमले में 76 सुरक्षाकर्मियों की जान चली गई थी। इनमें सीआरपीएफ की 62वीं बटालियन के 75 जवान और राज्य पुलिस का एक हवलदार शामिल था। यह देश में सुरक्षा बलों पर हुए सबसे घातक हमलों में से एक था। सुंदरराज ने बताया कि जिला प्रशासन, राज्य पुलिस और सीआरपीएफ ने मिलकर इस स्मारक का निर्माण किया है। उन्होंने बताया कि सुकमा सहित सात जिलों वाले बस्तर क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और विकास के लिए स्थानीय पुलिस, सीआरपीएफ, अन्य केंद्रीय सशस्त्र बलों और स्थानीय निवासियों ने सर्वोच्च बलिदान दिए हैं। छत्तीसगढ़ को विशेष रूप से चार दशकों से भी अधिक समय से वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूई) से जूझ रहे बस्तर क्षेत्र को 31 मार्च को सशस्त्र माओवादियों से मुक्त घोषित कर दिया गया।

 

 

जिंदगी और सिस्टम के बीच 17 KM की दूरी

राहुल ठाकुर गरियाबंद

गरियाबंद जिले में स्वास्थ्य विभाग की बदहाली का आलम इस तस्वीर से साफ झलकता है।


तस्वीरें बेहद चिंताजनक हैं। गरियाबंद जिले के मैनपुर क्षेत्र के दूरस्थ अंचल में बसे भालुडिग्गी गांव में स्वास्थ्य सुविधाएं नाम मात्र की भी नहीं हैं।

यही वजह है कि ग्रामीणों को 17 किलोमीटर की कठिन और दुर्गम पहाड़ी, कंटीले जंगलों को पार कर बीमार मन्नू नेताम को खाट-कांवड़ नुमा बिस्तर में लादकर पैदल ले जाना पड़ा। ग्रामीण किसी तरह 17 किलोमीटर का सफर तय कर कुल्हाड़ीघाट पहुंचे।

समय रहते सरकारी एम्बुलेंस नहीं मिलने के कारण मरीज को निजी वाहन से मैनपुर स्थित स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहां मरीज की गंभीर हालत को देखते हुए उसे गरियाबंद जिला अस्पताल रेफर कर भर्ती किया गया।

एक तरफ केंद्र और राज्य सरकारें मुफ्त चिकित्सा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के बड़े-बड़े दावे करती हैं, वहीं दूसरी ओर यह तस्वीर उन दावों की हकीकत बयां करती है। यह साफ दर्शाता है कि सरकारी दावे केवल कागजों और वाहवाही तक ही सीमित रह जाते हैं।

बहरहाल, क्षेत्र के विधायक जनक राम ध्रुव ने भी सिस्टम पर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि इलाके में सड़क, शिक्षा, पानी और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं को लेकर कई बार आमजन और जनप्रतिनिधियों द्वारा मांग और प्रदर्शन किए गए, लेकिन अब तक इन मांगों पर न तो अमल हुआ और न ही ग्रामीणों की सुध ली गई।

नतीजा सबके सामने है। अब इसे सिस्टम की नाकामी कहें या जिम्मेदारों का गैर-जिम्मेदाराना रवैया।

वहीं इस मामले में मुख्य चिकित्सा अधिकारी यू.एस. नवरत्न का कहना है कि भालुडिग्गी एक दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र है, जहां न सड़क है और न ही मोबाइल कनेक्टिविटी। यही कारण है कि वहां एम्बुलेंस या 108 वाहन का पहुंचना संभव नहीं है। उन्होंने जल्द ही पहाड़ी के नीचे बसे गांव कुल्हाड़ीघाट में स्थायी रूप से 108 एम्बुलेंस तैनात करने की बात कही है।

फिलहाल, बीमार मन्नू राम नेताम का इलाज गरियाबंद जिला अस्पताल में जारी है।