मदर्स डे स्पेशल: माँ की ममता को लकड़ी में उकेरने वाले शिल्पी, एक ही लकड़ी से गढ़ दी माँ-बेटे के प्रेम की जीवंत कहानी
माँ… केवल एक शब्द नहीं, बल्कि वह एहसास है जिसमें संसार की सारी ममता, त्याग, स्नेह और अपनापन समाया होता है। बच्चे की पहली मुस्कान से लेकर उसके हर दर्द तक, माँ अपने जीवन का हर पल अपने बच्चे के नाम कर देती है। इसी निश्छल प्रेम और अटूट रिश्ते को छत्तीसगढ़ के भिलाई नगर के मशहूर काष्ठ शिल्पी श्रवण चोपकर ने अपनी अद्भुत कला के माध्यम से लकड़ी में जीवंत कर दिया है।
इस्पात नगरी भिलाई के सेक्टर-02 निवासी 84 वर्षीय श्रवण चोपकर ने मदर्स डे के अवसर पर शीशम की एक ही लकड़ी से ऐसा अनोखा शिल्प तैयार किया है, जिसे देखकर हर किसी की आंखों में माँ के प्रति सम्मान और भावनाओं की लहर दौड़ जाती है। यह सिर्फ एक लकड़ी की मूर्ति नहीं, बल्कि माँ और बच्चे के बीच के उस पवित्र रिश्ते की कहानी है, जो जन्म से लेकर जीवनभर सांसों की तरह साथ चलता है।
करीब 18 इंच लंबी, 8 इंच चौड़ी और डेढ़ इंच मोटी शीशम की लकड़ी को ढाई महीने की अथक मेहनत और बारीक कारीगरी से तराशकर श्रवण चोपकर ने “ममता की मूरत” का रूप दिया है। इस अद्भुत कृति की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें कहीं भी किसी प्रकार का जोड़, कील या फेविकोल का इस्तेमाल नहीं किया गया है। पूरी कलाकृति एक ही लकड़ी के टुकड़े से बनाई गई है, जिसमें माँ और बच्चे के वात्सल्य भरे नौ अलग-अलग रूपों को मूवमेंट के जरिए दर्शाया गया है।
इस कलाकृति में माँ द्वारा बच्चे को नहलाना, सिर पर पानी डालना, गोद में झुलाना, खाना खिलाना और अपने आंचल में सहेज लेना जैसे दृश्य इतने जीवंत लगते हैं, मानो लकड़ी नहीं बल्कि ममता खुद सांस ले रही हो। हर आकृति में माँ के चेहरे का स्नेह और बच्चे की मासूमियत साफ दिखाई देती है। शिल्प को देखकर ऐसा महसूस होता है जैसे माँ का प्यार समय और शब्दों से कहीं बड़ा होता है।
श्रवण चोपकर ने इस शिल्प में “चेन कटिंग” तकनीक का उपयोग करते हुए माँ की चोटी को विशेष रूप दिया है, जो उनकी कला की अलग पहचान बन चुकी है। लकड़ी के भीतर इतनी महीन कटिंग और मूवमेंट देना तकनीकी रूप से बेहद कठिन माना जाता है, लेकिन दशकों के अनुभव और कला के प्रति समर्पण ने उनकी इस रचना को अद्वितीय बना दिया।
श्रवण चोपकर बताते हैं कि उनका उद्देश्य केवल एक कलाकृति बनाना नहीं था, बल्कि छत्तीसगढ़ की उस संस्कृति और पारिवारिक भावनाओं को दुनिया के सामने लाना था, जहां माँ और बच्चे का रिश्ता सबसे पवित्र माना जाता है। उनका कहना है कि आज के आधुनिक दौर में भी माँ की ममता और संस्कार ही परिवार को जोड़े रखते हैं, और यही संदेश वह अपनी कला के माध्यम से देना चाहते हैं।
काष्ठ कला के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना चुके श्रवण चोपकर का नाम वर्ष 2012 में Limca Book of Records और India Book of Records में भी दर्ज हो चुका है। उनकी कलाकृतियां केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि देशभर में सराही जाती रही हैं।
मदर्स डे पर तैयार की गई यह अनूठी कृति आज लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। जो भी इस शिल्प को देखता है, वह कुछ क्षणों के लिए अपनी माँ की यादों में खो जाता है। यह कला केवल लकड़ी की नक्काशी नहीं, बल्कि उस भावना की अभिव्यक्ति है, जिसे शब्दों में पूरी तरह बयां नहीं किया जा सकता — माँ की ममता।






