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शनि. मई 16th, 2026

MP: डैम की लहरों में समाई कई जिंदगियां, मां-बेटे की आई तस्वीर ने देश को झकझोरा

CG: “आंसुओं से मुस्कान तक: सरपंच ने मजदूरों को दिया जिंदगी का सबसे बड़ा गिफ्ट”

जिन्होंने कभी हवाई जहाज को दूर से देखा था… आज उसी में बैठकर भगवान के दर पहुंचे

अर्जुन्दा/बालोद 

छत्तीसगढ़: बालोद जिले के ग्राम टिकरी से एक ऐसी प्रेरणादायक खबर सामने आई है, जिसने न सिर्फ जिले बल्कि पूरे प्रदेश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। यहां की सरपंच ललिता रितेश देवांगन ने मजदूर दिवस (1 मई) के अवसर पर एक अनूठी पहल करते हुए गांव के पांच गरीब मजदूरों को हवाई जहाज से उड़ीसा स्थित जगन्नाथ पुरी मंदिर के दर्शन के लिए भेजा। खास बात यह है कि अब ये सभी मजदूर सुरक्षित पुरी पहुंच भी चुके हैं और अपने जीवन के इस खास पल को जी रहे हैं।

गांव के जिन मजदूरों ने अब तक हवाई जहाज को सिर्फ आसमान में उड़ते देखा था, उनके लिए यह यात्रा किसी सपने के साकार होने से कम नहीं है। आर्थिक रूप से कमजोर इन परिवारों के लिए हवाई यात्रा करना लगभग असंभव था, लेकिन सरपंच की इस पहल ने उनके जीवन में खुशी और आत्मसम्मान की नई रोशनी भर दी है।

इस पहल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस पूरी यात्रा का खर्च सरपंच ललिता रितेश देवांगन स्वयं अपने मानदेय से वहन कर रही हैं। यह न केवल उनकी सेवा भावना को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि जनप्रतिनिधि अगर चाहें तो अपने स्तर पर भी समाज में बड़ा बदलाव ला सकते हैं।

यह पहल केवल धार्मिक यात्रा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मजदूरों के सम्मान और उनके योगदान को पहचान देने की एक सार्थक कोशिश है। रोजमर्रा की कठिन मेहनत के बीच इन मजदूरों को एक ऐसा अवसर मिला है, जो उनके जीवन की यादगार बन गया है।

 

सरपंच ललिता देवांगन इससे पहले भी अपने “मिशन अनमोल मुस्कान” के जरिए गांव में शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास जैसे क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभाती रही हैं। इस मिशन के तहत बच्चों, महिलाओं और युवाओं के लिए कई सकारात्मक गतिविधियां आयोजित की जाती हैं, जिससे गांव में जागरूकता और विकास का माहौल बना है।

सरपंच की इस पहल की चर्चा अब पूरे छत्तीसगढ़ में हो रही है। लोग इसे एक आदर्श जनसेवा और संवेदनशील नेतृत्व का उदाहरण मान रहे हैं। यह पहल यह संदेश देती है कि अगर नीयत साफ हो और सोच सकारात्मक हो, तो छोटे से गांव से भी बड़े बदलाव की शुरुआत की जा सकती है।

बालोद के टिकरी गांव से निकली यह कहानी सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि एक प्रेरणा है-जो यह सिखाती है कि समाज में बदलाव लाने के लिए बड़े पद या बड़े संसाधनों की नहीं, बल्कि बड़े दिल और सच्ची नीयत की जरूरत होती है।

CG: “शहादत की मिट्टी से उठी आवाज, सुकमा ने फिर लिखा इतिहास”

सुकमा शहादत की नींव पर खड़ा हुआ नक्सल मुक्त भविष्य दोरनापाल में ‘शहीद स्मारक’ का लोकार्पण
बुरकापाल के अमर शहीदों को दी गई भावभीनी श्रद्धांजलि, डीआईजी और कलेक्टर ने वीरों के बलिदान को किया नमन

सुकमा धर्मेन्द्र सिंह/ सुकमा जिला आज नक्सलवाद के काले साये से मुक्त होकर विकास की नई इबारत लिख रहा है। इस शांति और सुरक्षा के पीछे उन वीर जवानों का सर्वोच्च बलिदान है, जिन्होंने बुरकापाल जैसे दुर्गम क्षेत्रों में राष्ट्र की एकता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। इसी कड़ी में आज शुक्रवार को 74वीं बटालियन मुख्यालय, दोरनापाल में वर्ष 2017 की बुरकापाल घटना में शहीद हुए 25 वीर जवानों की स्मृति में नवनिर्मित शहीद स्मारक का गरिमामय लोकार्पण किया गया।

सम्मान और गौरव का पल
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डीआईजी सीआरपीएफ आनंद सिंह राजपुरोहित ने विधिवत पूजा-अर्चना कर स्मारक का अनावरण किया। इस दौरान वातावरण अत्यंत भावुक और श्रद्धामय रहा। उपस्थित अधिकारियों और जवानों ने शस्त्र झुकाकर अपने वीर साथियों को सलामी दी और दो मिनट का मौन रखकर उनकी अमर स्मृति को नमन किया।

संघर्ष से शांति तक का सफर
लोकार्पण के अवसर पर वर्ष 2017 की उस हृदयविदारक घटना को याद किया गया, जब दोरनापाल-जगरगुंडा मार्ग निर्माण के दौरान नक्सलियों ने कायराना हमला किया था। अधिकारियों ने बताया कि एक समय यह क्षेत्र नक्सलवाद का गढ़ था, जहाँ सड़क बनाना किसी चुनौती से कम नहीं था।

आज अगर सुकमा नक्सल मुक्ति की दिशा में खड़ा है, तो इसका श्रेय उन जवानों को जाता है जिन्होंने जगरगुंडा मार्ग के पत्थर-पत्थर को अपने खून से सींचा है।

सुकमा कलेक्टर अमित कुमार ने इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर कहा कि सुकमा अब नक्सलवाद के दंश से मुक्त हो चुका है। उन्होंने कहा, “हमारे जवानों ने जो शहादत दी है, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। आज बुरकापाल के वीरों की याद में स्मारक का लोकार्पण कर हम उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर रहे हैं

बुरकापाल घटनास्थल पर भी दी श्रद्धांजलि
दोरनापाल में कार्यक्रम के पश्चात डीआईजी आनंद सिंह राजपुरोहित, कमांडेंट हिमांशु पांडे और कमांडेंट कुमार मयंक सीधे बुरकापाल स्थित वास्तविक घटनास्थल पर पहुँचे। वहां स्थित स्मारक पर पुष्पचक्र अर्पित कर शहीदों को याद किया गया। उपस्थित सभी जवानों ने संकल्प लिया कि वे शहीदों के आदर्शों पर चलते हुए राष्ट्र सेवा के लिए सदैव तत्पर रहेंगे।

छत्तीसगढ़ में साड़ी वितरण पर सियासत तेज: गुणवत्ता पर सवाल

छत्तीसगढ़ में महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को वितरित की गई साड़ियों को लेकर राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है। साड़ी वितरण योजना की गुणवत्ता पर सवाल उठने के बाद अब यह मामला सियासी रंग ले चुका है।

राज्य के कई जिलों से शिकायतें सामने आई हैं कि वितरित की गई साड़ियाँ खराब क्वालिटी की हैं और उपयोग के लायक नहीं हैं। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि साड़ियों का कपड़ा कमजोर है और उनका आकार भी मानक के अनुसार नहीं है।

इन आरोपों के बीच महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े ने सफाई देते हुए कहा कि सभी साड़ियाँ खराब नहीं हैं, लेकिन कुछ जगहों से गुणवत्ता को लेकर शिकायतें जरूर मिली हैं। वही मंत्री ने विपक्ष पर भी निशाना साधा और कांग्रेस के कार्यकाल को याद करते हुए कहा कि उनके समय भी साड़ी वितरण में भ्रष्टाचार के आरोप लगते थे। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि “कांग्रेस शासन में जो साड़ियाँ आती थीं, वे पहनने लायक नहीं होती थीं, बल्कि मछली पकड़ने के काम आती थीं।”

वहीं, कांग्रेस ने मंत्री के बयान पर पलटवार करते हुए वर्तमान सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। कांग्रेस का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी सरकार में भ्रष्टाचार चरम पर है और लगभग हर विभाग में कमीशनखोरी हो रही है।

कांग्रेस संचार विभाग अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला ने दावा किया कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को जो साड़ियाँ दी गई हैं, उनकी लंबाई करीब 4.5 मीटर है, जबकि सामान्य साड़ी की लंबाई 5.5 से 6 मीटर होती है। ऐसे में महिलाएं इन साड़ियों का उपयोग सही तरीके से नहीं कर पा रही हैं। पार्टी ने आरोप लगाया कि सरकारी खरीद में बड़े स्तर पर अनियमितता और कमीशनखोरी हो रही है।

फिलहाल यह मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है और आने वाले दिनों में इस पर और घमासान देखने को मिल सकता है।

जिंदगी और सिस्टम के बीच 17 KM की दूरी

राहुल ठाकुर गरियाबंद

गरियाबंद जिले में स्वास्थ्य विभाग की बदहाली का आलम इस तस्वीर से साफ झलकता है।


तस्वीरें बेहद चिंताजनक हैं। गरियाबंद जिले के मैनपुर क्षेत्र के दूरस्थ अंचल में बसे भालुडिग्गी गांव में स्वास्थ्य सुविधाएं नाम मात्र की भी नहीं हैं।

यही वजह है कि ग्रामीणों को 17 किलोमीटर की कठिन और दुर्गम पहाड़ी, कंटीले जंगलों को पार कर बीमार मन्नू नेताम को खाट-कांवड़ नुमा बिस्तर में लादकर पैदल ले जाना पड़ा। ग्रामीण किसी तरह 17 किलोमीटर का सफर तय कर कुल्हाड़ीघाट पहुंचे।

समय रहते सरकारी एम्बुलेंस नहीं मिलने के कारण मरीज को निजी वाहन से मैनपुर स्थित स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहां मरीज की गंभीर हालत को देखते हुए उसे गरियाबंद जिला अस्पताल रेफर कर भर्ती किया गया।

एक तरफ केंद्र और राज्य सरकारें मुफ्त चिकित्सा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के बड़े-बड़े दावे करती हैं, वहीं दूसरी ओर यह तस्वीर उन दावों की हकीकत बयां करती है। यह साफ दर्शाता है कि सरकारी दावे केवल कागजों और वाहवाही तक ही सीमित रह जाते हैं।

बहरहाल, क्षेत्र के विधायक जनक राम ध्रुव ने भी सिस्टम पर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि इलाके में सड़क, शिक्षा, पानी और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं को लेकर कई बार आमजन और जनप्रतिनिधियों द्वारा मांग और प्रदर्शन किए गए, लेकिन अब तक इन मांगों पर न तो अमल हुआ और न ही ग्रामीणों की सुध ली गई।

नतीजा सबके सामने है। अब इसे सिस्टम की नाकामी कहें या जिम्मेदारों का गैर-जिम्मेदाराना रवैया।

वहीं इस मामले में मुख्य चिकित्सा अधिकारी यू.एस. नवरत्न का कहना है कि भालुडिग्गी एक दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र है, जहां न सड़क है और न ही मोबाइल कनेक्टिविटी। यही कारण है कि वहां एम्बुलेंस या 108 वाहन का पहुंचना संभव नहीं है। उन्होंने जल्द ही पहाड़ी के नीचे बसे गांव कुल्हाड़ीघाट में स्थायी रूप से 108 एम्बुलेंस तैनात करने की बात कही है।

फिलहाल, बीमार मन्नू राम नेताम का इलाज गरियाबंद जिला अस्पताल में जारी है।

बालोद में ‘मुरुम घोटाला’! किसानों के श्रमदान पर फर्जी बिल, 3.17 लाख की बंदरबांट का आरोप

छत्तीसगढ़ के बालोद जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने सहकारी समितियों की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। किसानों की मेहनत और श्रमदान से तैयार हुए धान खरीदी केंद्र को कागजों में ‘घोटाले’ में बदल देने का आरोप लगा है।

मामला भर्रीटोला (43) सेवा सहकारी समिति से जुड़ा है, जहां समिति प्रबंधक भिखम लाल साहू और प्राधिकृत अधिकारी कुसुमकसा भाजपा नेता योगेंद्र सिन्हा पर पद के दुरुपयोग का आरोप है। बताया जा रहा है कि समिति के प्रबंधक के साथ मिलीभगत कर 3 लाख 17 हजार रुपये का फर्जी बिल लगाया गया और रकम निकाल ली गई।

 कैसे हुआ ‘खेल’?

 

ग्रामीणों के अनुसार, भर्रीटोला समेत आसपास के गांवों—रजहिं, ककरेल, देवपांडुम, चिपरा और जुनवानी—के करीब 815 किसान कुसुमकसा स्थित सेवा सहकारी समिति में धान बेचने जाते हैं। दूरी ज्यादा होने से परेशान किसानों ने अपने गांव में ही खरीदी केंद्र खोलने की मांग की थी।

मांग पूरी होने पर किसानों ने खुद चंदा इकट्ठा किया, मुरुम मंगवाया और श्रमदान कर जमीन समतल की। यानी पूरा काम गांव वालों ने अपने दम पर किया।

लेकिन आरोप है कि इसी काम के नाम पर समिति प्रबंधक ने योगेन्द्र सिन्हा फर्म के नाम से 3.17 लाख रुपये का फर्जी बिल लगाकर चेक जारी कर दिया।

खुलासा और फिर ‘डैमेज कंट्रोल’

जब यह मामला ग्रामीणों के बीच उजागर हुआ तो विवाद बढ़ने लगा। दबाव बढ़ते ही प्रबंधक भिखम लाल साहू ने रकम वापस समिति के खाते में जमा करा दी। लेकिन सवाल यह है कि अगर गड़बड़ी नहीं थी, तो पैसे लौटाने की नौबत क्यों आई?

किसानों का आरोप

ग्रामीणों का साफ कहना है—

“जब हमने खुद चंदा और श्रमदान से काम किया, तो फिर लाखों रुपये का भुगतान किस बात का किया गया? यह सीधा-सीधा भ्रष्टाचार है, इसकी जांच होनी चाहिए।”

प्रबंधक की सफाई

समिति प्रबंधक का कहना है कि उन्हें प्राधिकृत अधिकारी योगेंद्र सिन्हा द्वारा चेक दिया गया था और उन्हें यह जानकारी नहीं थी कि मुरुम ग्रामीणों ने खुद डलवाया है। बाद में जानकारी मिलने पर राशि वापस जमा कर दी गई।

बड़ा सवाल

यह मामला सिर्फ एक गांव का नहीं, बल्कि सहकारी समितियों में संभावित भ्रष्टाचार के उस मॉडल की झलक है, जहां
👉 कागजों में काम दिखाकर पैसे निकाले जाते हैं
👉 ग्रामीणों की मेहनत पर ‘फर्जी बिल’ बनते हैं

अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या वाकई दोषियों पर कार्रवाई होती है या मामला फिर से ‘रफा-दफा’ कर दिया जाएगा।

जब कलेक्टर खुद पहुंचे महुआ बीन रही ‘मंगली’ के द्वार

सुकमा धर्मेन्द्र सिंह/ बस्तर के सुदूर अंचलों में शिक्षा की लौ जलाने के लिए प्रशासन अब केवल दफ्तरों तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीन पर उतरकर भविष्य संवारने में जुटा है। कलेक्टर अमित कुमार के हालिया दौरे में एक ऐसी ही दिल को छू लेने वाली तस्वीर सामने आई, जिसने यह साबित कर दिया कि एक संवेदनशील नेतृत्व किस तरह बदलाव की नींव रखता है।

 

खेतों के बीच रुका काफिला, जागा भविष्य

गुरुवार को जब कलेक्टर मारोकी, मानकापाल, परिया और कुचारास जैसे दूरस्थ गाँवों के दौरे पर थे, तब उनकी नजर सड़क किनारे महुआ बीनती एक छोटी बच्ची पर पड़ी। भीषण गर्मी में जहां बच्चे महुआ इकट्ठा करने में व्यस्त थे, कलेक्टर ने अपना काफिला रुकवाया और सीधे खेतों के बीच पेड़ के पास पहुंच गए। कलेक्टर ने बड़े ही आत्मीय भाव से बच्ची से बात की। बच्ची ने अपना नाम मड़कामी मंगली बताया। जब उससे स्कूल न जाने का कारण पूछा गया, तो मासूमियत और अभाव की कहानी सामने आई।

 

कलेक्टर अमित कुमार ने बताया कि प्रशासन का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी बच्चा संसाधनों या जागरूकता के अभाव में शिक्षा की मुख्यधारा से न छूटे। महुआ बीनने वाले हाथ कलम थामेंगे, तभी सुकमा का असली विकास होगा। लगातार पालक-शिक्षक बैठक आयोजित किया जा रहा है। शिक्षक भी लगातार ड्राप आउट बच्चों के घर जाकर समझा रहे हैं।

 

चौपाल नहीं, सीधा घर तक पहुंची सरकार

प्रशासन का मानवीय चेहरा तब और प्रखर हुआ जब कलेक्टर मंगली से बात कर नहीं रुके, बल्कि उसके माता-पिता से मिलने सीधे उसके घर पहुंच गए।

 संवाद और संवेदनशीलता उन्होंने पालकों को समझाया कि शिक्षा ही वह एकमात्र रास्ता है जिससे उनके बच्चों का जीवन संवर सकता है।

 समस्या का समाधान उन्होंने पालक से पूछा कि बच्चे को स्कूल भेजने में कोई दिक्कत है क्या! 

 सकारात्मक परिणाम कलेक्टर की समझाइश और आत्मीयता का असर यह हुआ कि मंगली के माता-पिता उसे तुरंत स्कूल भेजने के लिए राजी हो गए।

 

मौके पर ही दिए दाखिले के निर्देश

कलेक्टर अमित कुमार ने केवल संवाद नहीं किया, बल्कि तत्काल समाधान भी सुनिश्चित किया। उन्होंने मौके पर मौजूद बीआरसी को निर्देश दिए कि मंगली के साथ-साथ वहां मौजूद एक अन्य बालक माड़वी देवा का भी नियमित स्कूल जाना सुनिश्चित किया जाए और उन्हें आवासीय विद्यालय में भर्ती किया जाए। इस अवसर पर जिला सीईओ मुकुन्द ठाकुर भी उपस्थित थे। प्रशासन के इस जमीनी और भावनात्मक प्रयास की पूरे क्षेत्र में सराहना हो रही है।

BREAKING NEWS बालोद में प्रशासन का बुलडोजर एक्शन

आदेश का पालन नहीं करने वालों के खिलाफ आज सुबह करीब 6 बजे से प्रशासन की टीम अलग-अलग टुकड़ों में कार्रवाई कर रही है। अभियान की जानकारी मिलते ही कई दुकानदार मौके पर पहुंचने लगे हैं, वहीं कुछ स्थानों पर कार्रवाई को लेकर नाराजगी भी देखने को मिली है।

फिलहाल बालोद के गंजपारा से जेल क्षेत्र तक अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई जारी है। व्यापारियों के संभावित विरोध को देखते हुए मौके पर भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया है।

बालोद को खेल अधोसंरचना की बड़ी सौगात: 1300 लाख की परियोजनाएं स्वीकृत, बनेंगे स्टेडियम व इंडोर हॉल

बालोद। खेल प्रतिभाओं से समृद्ध बालोद जिले के लिए गर्व का क्षण है। विधानसभा के हालिया बजट सत्र में जिले को खेल अधोसंरचना के लिए कुल 1300 लाख रुपये (13 करोड़ रुपये) की बड़ी सौगात मिली है। इस स्वीकृति से जिले में आधुनिक खेल सुविधाओं का नया अध्याय शुरू होने जा रहा है।

क्या-क्या होगा निर्माण?

दल्लीराजहरा में इंडोर मल्टीपरपज हॉल निर्माण हेतु 500 लाख रुपये स्वीकृत

वर्ष 2026-27 के लिए 200 लाख रुपये का प्रावधान

 

जिला स्तरीय बहुउद्देश्यीय स्टेडियम निर्माण हेतु 800 लाख रुपये स्वीकृत

वर्ष 2026-27 के लिए 200 लाख रुपये का प्रावधान

इन परियोजनाओं के पूर्ण होने पर एथलेटिक्स, कबड्डी, वॉलीबॉल, बैडमिंटन सहित विभिन्न खेलों के खिलाड़ियों को अभ्यास और प्रतियोगिताओं के लिए आधुनिक मंच मिलेगा।

जनप्रतिनिधियों के प्रयास रंग लाए

जिले में खेल सुविधाओं की मांग को लेकर भाजपा नेता राकेश यादव तथा छत्तीसगढ़ एथलेटिक्स संघ के प्रदेश उपाध्यक्ष एवं भाजपा जिला महामंत्री सौरभ लूनिया लगातार प्रयासरत थे।

उन्होंने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह, खेल मंत्री अरुण साव तथा वित्त मंत्री ओपी चौधरी से मुलाकात और पत्राचार कर जिले की खेल आवश्यकताओं को प्रमुखता से रखा।

 

लगातार प्रयासों का ही परिणाम है कि बजट सत्र में इन महत्वपूर्ण परियोजनाओं को स्वीकृति मिली, जिसे जिले की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

 

खिलाड़ियों के सपनों को मिलेंगे पंख

नई खेल अधोसंरचना तैयार होने से ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के खिलाड़ियों को जिला स्तर पर ही बेहतर प्रशिक्षण सुविधा मिलेगी। इससे:

 

प्रतिभाओं को बाहर बड़े शहरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा

स्थानीय स्तर पर प्रतियोगिताओं का आयोजन संभव होगा

युवाओं में खेल के प्रति उत्साह और करियर के अवसर बढ़ेंगे

 

स्वीकृति मिलने पर सौरभ लूनिया ने मुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष, खेल मंत्री, वित्त मंत्री, भाजपा प्रदेश महामंत्री यशवंत जैन एवं जिलाध्यक्ष चेमन देशमुख का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार खेल प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है और बालोद को मिली यह सौगात आने वाले वर्षों में ऐतिहासिक साबित होगी।

 

निश्चित ही, यह फैसला बालोद को खेल मानचित्र पर नई पहचान दिलाने की दिशा में एक मजबूत कदम है। 🏆

दल्लीराजहरा: 1955 से आज तक खनन का सफर, भिलाई इस्पात संयंत्र की धड़कन बनी लौह अयस्क खदानों का इतिहास

छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में स्थित दल्लीराजहरा की लौह अयस्क खदानों ने न केवल औद्योगिक विकास की इबारत लिखी, बल्कि श्रमिक आंदोलनों और सामाजिक परिवर्तन की भी मिसाल कायम की। वर्ष 1955 में खनन कार्य की शुरुआत के साथ यह क्षेत्र देश के औद्योगिक मानचित्र पर उभरा और आज भी अपनी ऐतिहासिक पहचान बनाए हुए है।

1955: औद्योगिक युग की शुरुआत
सन् 1955 में जब भिलाई इस्पात संयंत्र (BSP) की स्थापना हुई, तब उच्च गुणवत्ता वाले लौह अयस्क की आपूर्ति के लिए दल्लीराजहरा की खदानों का विकास किया गया। 1959 में भिलाई इस्पात संयंत्र में उत्पादन शुरू हुआ और दल्लीराजहरा उसकी जीवनरेखा बन गया।

1960–1980: श्रमिक संघर्ष और सामाजिक जागरण
इन दशकों में खदानों में हजारों मजदूर कार्यरत रहे। बेहतर वेतन, सुरक्षा और अधिकारों की मांग को लेकर बड़े श्रमिक आंदोलन हुए। इस दौर में शंकर गुहा नियोगी के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ मजदूर आंदोलन ने नई दिशा पाई। दल्लीराजहरा देशभर में श्रमिक एकता और संघर्ष का प्रतीक बना।

1990–2000: तकनीकी आधुनिकीकरण
समय के साथ खनन प्रक्रिया में आधुनिक मशीनों और नई तकनीकों का उपयोग बढ़ा। जिससे उत्पादन क्षमता में वृद्धि हुई ।

2000 के बाद: नए विकल्प और बदलाव
छत्तीसगढ़ राज्य गठन (2000) के बाद औद्योगिक नीतियों में बदलाव आए। धीरे-धीरे भिलाई इस्पात संयंत्र के लिए लौह अयस्क की आपूर्ति के नए स्रोत विकसित किए गए, जिससे दल्लीराजहरा की निर्भरता कम हुई। इसके बावजूद यह क्षेत्र ऐतिहासिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बना हुआ है।

वर्तमान स्थिति
आज दल्लीराजहरा की खदानें सीमित उत्पादन के साथ संचालित हैं। क्षेत्र में वैकल्पिक रोजगार, पर्यटन और ऐतिहासिक पहचान को संजोने के प्रयास जारी हैं। स्थानीय लोगों के लिए यह सिर्फ खदान नहीं, बल्कि संघर्ष, विकास और पहचान का प्रतीक है।

✍️ निष्कर्ष
1955 से शुरू हुआ दल्लीराजहरा माइंस का सफर केवल खनन तक सीमित नहीं रहा। यह औद्योगिक प्रगति, श्रमिक अधिकारों की लड़ाई और सामाजिक परिवर्तन की कहानी भी है। बदलते समय के साथ चुनौतियाँ जरूर आईं, लेकिन दल्लीराजहरा आज भी छत्तीसगढ़ के औद्योगिक इतिहास का स्वर्णिम अध्याय बना हुआ है।