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शनि. मई 16th, 2026

धान की फसल पर पत्ती मोड़क कीट का प्रकोप, किसानों को सतर्क रहने की सलाह

सुकमा @ जिले के बोदागुड़ा, रामाराम, मुरतोंडा, सोनाकुकानार, धोबनपाल, पुजारीपाल और रामपुरम गांवों में धान की फसल पर पत्ती मोड़क कीट (सोरटी) का प्रकोप देखा गया है। कृषि विज्ञान केन्द्र सुकमा के वैज्ञानिकों राजेन्द्र प्रसाद कश्यप एवं डॉ. योगेश कुमार सिदार ने किसानों को सतर्क रहने की अपील की है।विशेषज्ञों के अनुसार यह कीट पत्तियों को लपेटकर अंदर छिप जाता है और हरे भाग को खाकर फसल की वृद्धि रोक देता है, जिससे उपज पर सीधा असर पड़ता है।

नियंत्रण उपायों में खेत की सफाई, संतुलित खाद, पक्षी मीनार, प्रकाश प्रपंच, रस्सी चलाना, अंडे व इल्ली नष्ट करना, मित्र कीटों का संरक्षण तथा नीम आधारित जैविक दवाओं का छिड़काव शामिल है। आवश्यकता पड़ने पर ही अनुशंसित रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग करने की सलाह दी गई है।कृषि विज्ञान केन्द्र ने किसानों से अपील की है कि वे बिना वैज्ञानिक परामर्श के रासायनिक दवाओं का प्रयोग न करें और समय पर प्रबंधन कर अपनी फसल को सुरक्षित रखें।

खेती में तकनीकी नवाचार से समृद्धि: नवागढ़ के किसान संतोष साहू बने प्रेरणा स्रोत,पैडी ट्रांसप्लांटर ने आसान की रोपाई, प्रति एकड़ 7 हजार की जगह 400 रूपए में हुआ काम

रायपुर डेस्क @ खेती को लाभकारी व्यवसाय बनाने की दिशा में छत्तीसगढ़ के किसान निरंतर नवाचार अपना रहे हैं। इसी कड़ी में विकासखंड नवागढ़ के ग्राम मुरता निवासी कृषक श्री संतोष साहू पिता बुधारी साहू अपने क्षेत्र के किसानों के लिए एक मिसाल बनकर उभरे हैं। आधुनिक तकनीकों को अपनाकर इन्होंने अपनी खेती को न केवल लाभकारी बनाया, बल्कि अन्य किसानों को भी प्रेरित किया है। श्री साहू विगत दो वर्षों से धान की खेती में ’पैडी ट्रांसप्लांटर’ तकनीक का सफलतापूर्वक उपयोग कर रहे हैं। यह तकनीक खेतों में धान की रोपाई के पारंपरिक तरीकों की तुलना में कहीं अधिक सस्ती, समय की बचत करने वाली और उत्पादन में वृद्धि देने वाली साबित हो रही है।

कम लागत, अधिक लाभ 

श्री साहू ने जानकारी दी कि पहले परंपरागत पद्धति से प्रति एकड़ धान रोपाई में 7,000 से 8,000 रुपये की मजदूरी खर्च होती थी। किंतु अब पैडी ट्रांसप्लांटर मशीन के माध्यम से यही कार्य केवल 400 से 500 रुपये प्रति एकड़ में संपन्न हो जाता है। इससे न केवल उत्पादन लागत में भारी कमी आई है, बल्कि काम की गति और गुणवत्ता में भी सुधार हुआ है।

उत्पादन में बढ़ोतरी और रोग नियंत्रण में मदद

पैडी ट्रांसप्लांटर तकनीक के जरिए रोपी गई धान की फसल में पौधों की समान दूरी और बेहतर रोपाई होने के कारण पौधे मजबूत और स्वस्थ बनते हैं। परिणामस्वरूप, फसल में कीट एवं रोगों का प्रकोप कम होता है और उपज अधिक प्राप्त होती है। श्री साहू ने बताया कि इस तकनीक से उन्हें अपेक्षाकृत बेहतर उत्पादन प्राप्त हो रहा है।

अन्य किसानों के लिए भी कर रहे सहयोग

सिर्फ अपने खेत तक सीमित न रहते हुए संतोष साहू आसपास के किसानों की फसलों में भी पैडी ट्रांसप्लांटर से रोपाई का कार्य कर उन्हें लाभान्वित कर रहे हैं। यह पहल ग्रामीण क्षेत्र में कृषि यांत्रिकीकरण को बढ़ावा देने में भी मददगार सिद्ध हो रही है।

फसल प्रदर्शन योजना का भी उठा रहे लाभ

श्री साहू छत्तीसगढ़ शासन द्वारा संचालित फसल प्रदर्शन योजना के तहत भी लाभ प्राप्त कर रहे हैं। इस योजना के अंतर्गत उन्नत तकनीकों और बीजों के उपयोग को प्रोत्साहित किया जाता है, जिससे किसान वैज्ञानिक तरीकों से खेती कर अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकें। इस प्रकार नवाचार की राह पर अग्रसर होते ग्राम मुड़ता के संतोष साहू जैसे किसान यह सिद्ध कर रहे हैं कि यदि खेती में समय के साथ बदलाव और तकनीक को अपनाया जाए, तो कृषि एक सफल, लाभकारी और आधुनिक व्यवसाय बन सकता है। ऐसे प्रगतिशील किसान छत्तीसगढ़ की कृषि के उज्ज्वल भविष्य की नींव रख रहे हैं और अन्य कृषकों के लिए एक प्रेरणा बन रहे हैं।

नैनो डीएपी से प्रति एकड़ 75 रूपए की बचत, आसानी से उपलब्ध और उपयोग भी सरल,खरीफ मौसम में धान की बुआई व रोपा में तेजी

रायपुर डेस्क @ खरीफ सीजन की शुरुआत के साथ ही राज्य में पर्याप्त बारिश के बाद किसानों ने धान की बुआई-रोपाई का काम तेजी कर दिया है। इस वर्ष किसानों को समय पर खाद और बीज की उपलब्धता ने न केवल बुवाई-रोपाई को सुगम बनाया है, बल्कि किसानों को खेती की लागत में कमी से भी फायदा पहुंचाया है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के निर्देश पर इस वर्ष चालू खरीफ मौसम में किसानों को प्राथमिक सहकारी कृषि साख समितियों के माध्यम से खाद-बीज की समय पर आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है। इससे किसानों को न तो लाइन में लगना पड़ रहा है और न ही खाद-बीज की कालाबाज़ारी या कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। डीएपी की कमी को नैनो डीएपी और दूसरी खादों के उपयोग से पूरा करने की सरकार की रणनीति ने भी इस बार खेती-किसानी के काम को समय पर पूरा करने में खासी भूमिका निभाई है।

कोरबा जिले के ग्राम जामबहार के प्रगतिशील किसान जगत पाल सिंह ने इस साल ठोस डीएपी की कमी के बावजूद शासन की व्यवस्थाओं की सराहना करते हुए कहा कि उन्हें इस वर्ष खाद-बीज लेने में किसी प्रकार की असुविधा नहीं हुई है। 22 एकड़ भूमि में खेती करने वाले श्री सिंह ने बताया कि उन्होंने प्राथमिक सहकारी कृषि साख समिति सोनपुरी से यूरिया, डीएपी और नैनो डीएपी लिया है। उन्होंने कहा कि सरकार की किसानों को समय पर खाद-बीज भरपूर मात्रा में उपलब्ध कराने की व्यवस्था ने खूब फायदा पहुंचाया है। खाद-बीज समय पर उपलब्ध हो गए हैं, जिससे खेतों में धान की बुवाई समय पर हो गई और लागत भी घटी है।

श्री सिंह ने नैनो डीएपी को भविष्य की खेती का स्मार्ट समाधान बताया। उन्होंने कहा कि कम मात्रा में अधिक प्रभाव वाला यह उर्वरक उत्पादन बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो रहा है। श्री सिंह ने कहा कि ठोस डीएपी की कमी को पूरा करने के लिए सरकार ने तरल नैनो डीएपी की भरपूर व्यवस्था कर दी है। तरल नैनो डीएपी से किसानों को धान की एक एकड़ फसल में लागत पर 75 रूपए का फायदा हो रहा है। उन्होंने कहा कि जहां एक एकड़ धान में डालने के लिए ठोस डीएपी की एक बोरी पर एक हजार 350 रूपए खर्च आता है, वहीं तरल नैनो डीएपी को आधी बोरी ठोस डीएपी के साथ एक एकड़ धान में उपयोग करने पर केवल एक हजार 275 रूपए ही लगते है।

इस तरह किसानों को एक एकड़ में 75 रूपए की लागत कम लग रही है। जगत पाल सिंह ने शासन और मुख्यमंत्री के प्रति आभार प्रकट करते हुए कहा कि विष्णुदेव सरकार की योजनाओं ने किसानों में एक नया भरोसा जगाया है। अब हम बिना तनाव के पूरी निष्ठा से खेती कर पा रहे हैं। यह आत्मनिर्भरता की ओर एक बड़ा कदम है। राज्य सरकार की ये योजनाएं न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रही हैं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी ताकत दे रही हैं।

मुख्यमंत्री के नेतृत्व में प्रदेश सरकार किसानों को आत्मनिर्भर बनाने और खेती को लाभकारी बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। प्राथमिक सहकारी कृषि साख समितियों की पारदर्शी वितरण व्यवस्थाएं, समयबद्ध आपूर्ति चेन और तकनीकी नवाचारों को प्राथमिकता देते हुए सरकार किसानों तक योजनाओं का लाभ पहुँचा रही है।

किसान मित्रो के लिए वरदान : नैनो डीएपी ,किसानों के लिए ठोस डीएपी उर्वरक का स्मार्ट विकल्प

एनबीसी इंडिया 24 न्यूज़ डेस्क रायपुर @ छत्तीसगढ़ सरकार किसानों को रासायनिक उर्वरकों की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए लगातार प्रयासरत है। खरीफ 2025 के दौरान डीएपी (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) की कमी को ध्यान में रखते हुए राज्य शासन ने इसके व्यवहारिक विकल्प के रूप में नैनो डीएपी के भंडारण एवं वितरण की विशेष व्यवस्था की है। इसके साथ ही एनपीके और एसएसपी जैसे वैकल्पिक उर्वरकों का भी लक्ष्य से अधिक मात्रा में भंडारण कराया गया है। खेती में ठोस डीएपी उर्वरक की कमी को पूरा करने के लिए किसानों को उसके विकल्प के अनुरूप कृषि वैज्ञानिकों के सुझाव के अनुरूप नैनो डीएपी अथवा एनपीके और सिंगल सुपर फास्फेट खाद की मात्रा का उपयोग करने की सलाह दी जा रही है।

नैनो डीएपी एक आधुनिक, किफायती और प्रभावशाली तरल उर्वरक है, जो पारंपरिक डीएपी की तुलना में कहीं अधिक उपयोगी और पोषक तत्वों से भरपूर है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के वैज्ञानिकों ने नैनो डीएपी का समर्थन करते हुए कहा है कि इसके उपयोग से खेती की लागत में कमी आती है। नैनो डीएपी खेत में पोषण की कमी को प्रभावी ढंग से पूरा करता है और उत्पादन की गुणवत्ता को भी बढ़ाता है। नैनो डीएपी पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित है। एक एकड़ धान की फसल के लिए एक बोरी ठोस डीएपी का उपयोग होता है। जिसकी लागत 1350 रूपए होती हैै, जबकि एक एकड़ में 25 किलो ठोस डीएपी और 500 मिली नैनो डीएपी के मिश्रण का उपयोग किया जाए तो इसकी लागत घटकर 1275 रूपए आती है।

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिकों ने एक एकड़ धान की खेती के लिए नैनो डीएपी की उपयोग की विधि की विस्तार से जानकारी दी है। इसके अनुसार नैनो डीएपी की मात्र साढ़े 600 मिली मात्रा एक एकड़ धान की खेती में लगती है। धान की बुआई से पहले एक एकड़ के लिए 30 किलो बीज को 150 मिली नैनो डीएपी को तीन लीटर पानी में घोलकर उसमें बीज उपचारित कर आधा घंटा छाव में सुखाने के बाद बुआई की जाती है। रोपा के समय 50 लीटर पानी में 250 मिली नैनो डीएपी को मिलाकर उसमें थरहा की जड़ों को आधा घंटा डूबाकर रखने के बाद रोपाई तथा फसल बोआई के तीस दिन बाद 125 लीटर पानी में 250 मिली नैनो डीएपी को घोलकर खड़ी फसल पर इसका छिड़काव करना होता है। इससे फसलों को पोषक तत्व मिल जाते है।

नैनो डीएपी फसलों को भरपूर मात्रा में पोषक तत्व प्रदान करने के लिए बेहतर विकल्प है। यह पारंपरिक डीएपी के मुकाबले लागत कम और प्रभाव अधिक है। पारंपरिक डीएपी की एक बोरी की कीमत लगभग 1350 रूपए होती है, वहीं नैनो डीएपी की एक बोतल से कई एकड़ भूमि को लाभ पहुंचाया जा सकता है। यह स्प्रे के माध्यम से सीधे पौधों पर छिड़का जाता है, जिससे पोषक तत्वों का त्वरित अवशोषण होता है।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के निर्देश के अनुरूप राज्य शासन द्वारा किसानों को डीएपी उर्वरक के विकल्प के रूप में नैनो डीएपी सहित वैकल्पिक उर्वरकों का पर्याप्त भण्डारण समितियों में किया जा रहा है। किसानों को इसके उपयोग के लिए प्रशिक्षण एवं जागरूकता शिविर भी आयोजित किए जा रहे हैं। कृषि विभाग ने किसानों से नैनो डीएपी तथा एनपीके, एसएसपी जैसे वैकल्पिक उर्वरकों का उपयोग करने की अपील की है।

वन्य जीव अब शहरों की ओर कर रहे रुख हाथी, तेंदुए और भालू के शहरों में दस्तक से दहशत में लोग

राहुल ठाकुर गरियाबंद @ गरियाबंद जिला इन दिनों हिंसक वन्य पशुओं के आतंक के साए में जी रहा है, हाथी फिंगेश्वर, गरियाबंद, मैनपुर क्षेत्र में बीते 3 सालों मे 8 लोगों की कुचल कर जान ले चुका है, तो वहीं तेंदुआ भी जिला मुख्यालय के रहवासी क्षेत्र में लगातार देखा जा रहा है, शहरी इलाके में तेंदुए की आमद ने लोगों की चिता बढ़ा दी है, अब एक और नई मुसीबत सामने आई है, जहां मैनपुर नगर के मध्य भालू विचरण करते नजर आ रहा है।

सीसीटीवी एवं लोगों के मोबाइल फोन में लगातार ये वन्य जीव कैद हो रहे हैं, इन स्थितियों के बीच गरियाबंद जिले के आम लोगों में चिंता का विषय बना हुआ है, वन विभाग से संबंध में चर्चा करने पर भी कहते हैं, लगातार ऐहतियातन रूप से कदम उठाए जा रहे हैं, वन विभाग के उच्च अधिकारी कहते है, गरियाबंद वन आच्छादित जिला है, और आम जनों को इन वन्य पशुओं के बीच रहने की आदत डाल लेनी चाहिए, हाथी के विचारण क्षेत्र को बदलना आसान नहीं होता, इसलिए वह अपने दिशा में ही बढ़ता है.

वहीं अन्य वन्य जीवों को अगर कोई छेड़ छाड़ ना करे या उसके रास्ते में ना आये तो कोई भी दिक्कत नहीं होगा, उच्च अधिकारियों को लगातार सूचना दी जा रही है, उनके निर्देशो पर कार्य किया जा रहा है, लेकिन लगातार शहरी इलाके में जिस तरह वन्य जीव सामने आ रहे है, ये गरियाबंद, मैनपुर और फिंगेश्वर जैसे शहरों के निवासियों के लिए एक चिंता का सबब बना हुआ है।

सफलता की कहानी : कृषि प्रधान छत्तीसगढ़ में कृषि कार्य कर इस गांव की दीदियां बदल रही है अपनी जिंदगी की तस्वीर

एनबीसी इंडिया ²⁴ न्यूज दंतेवाड़ा @ कृषि प्रधान छत्तीसगढ़ में कृषि कार्य अब लाभकारी हो चुका है, राज्य सरकार ने विगत वर्ष में कृषि क्षेत्र को प्राथमिकता देकर विभिन्न योजनाओं को संचालित किया है और इसका सीधा प्रभाव आज यथार्थ के धरातल पर परिलक्षित है। परंपरागत खेती में कई बदलावों के साथ अब राज्य के लोग आधुनिक एवं उन्नत तकनीक के साथ व्यावसायिक तौर पर खेती कर रहे हैं।

इसका सीधा लाभ कृषकों को हो रहा है। मुख्यतः धान की खेती के लिए प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ राज्य अब शाक सब्जियों की खेती का भी गढ़ बन रहा है। राज्य में सब्जी की खेती का फैलाव अब मैदानी इलाकों से निकलकर पहाड़ों तक हो चला है। खास तौर पर शाक सब्जियों की खेती के साथ वनांचलों के ग्रामीण भी जुड़ रहे हैं।

शाक सब्जियों की खेती वर्तमान में बेहद मुनाफे की खेती में परिवर्तित हो गई है। यही नहीं शाक सब्जियों की खेती में स्व सहायता समूहों की महिलाओं को जोड़े जाने के पहल ने भी कृषि क्षेत्र में भी कई बदलाव लाए है। अगर इसे फायदे के दृष्टिकोण से देखा जाएं तो महिलाओं के बड़े समूहों को घर बैठे रोजगार मिलने के साथ-साथ आर्थिक आमदनी में वृद्धि हुई है इसके अलावा गैर परम्परागत कृषि को प्रोत्साहन मिला।

इस क्रम में जिले के ग्राम पंचायत- झोडि़याबाड़म (कलार पारा) जय मां दंतेश्वरी स्व सहायता समूह (बिहान) की दीदी पीला बाई सेठिया, एवं मालेश्वरी सेठिया ने भी समूह से जुड़कर अपने कृषि कार्य को एक नयी दिशा दी है। ये दीदियां भी अन्य ग्रामीण महिलाओं की तरह पारंपरिक खेती पर निर्भर थी। स्पष्ट है कि इससे उनकी आय भी सीमित रहती थी। फिर उन्होंने बिहान योजना से जुड़ कर बैंक लिंकेज करवाकर ने अपनी आय बढ़ाने और खेती में कुछ नया करने का निर्णय लिया।

सर्वप्रथम उन्होंने उन्नत किस्म के टमाटर, मिर्ची को अपनाया जो अधिक उत्पादक और कीटों के प्रति प्रतिरोधी थीं। फिर ड्रिप इरिगेशन तकनीक माध्यम से उन्होंने पानी की बचत और पौधों को सही मात्रा में पानी देने की विधि अपनाई इससे ने केवल उत्पादन में वृद्धि हुई साथ ही साथ पानी का सही उपयोग भी हुआ।

इसके अलावा पीलाबाई एवं मालेश्वरी सेठिया ने ऑर्गेनिक खेती की तरफ भी ध्यान दिया और उन्होंने रासायनिक उर्वरकों की जगह जैविक खाद का उपयोग शुरू किया, जिससे उनकी फसल की गुणवत्ता बेहतर हुई और बाजार में उनके उगाए टमाटर की मांग बढ़ी।

इसके साथ ही उन्होंने ’’मल्चिंग तकनीक’’ (प्लास्टिक कवर का उपयोग) विधि अपना कर टमाटर, मिर्च की क्यारियों में मिट्टी की नमी को बनाया रखकर खरपतवार नियंत्रित भी किया। इससे भूमि की उर्वरता बनाए रखने में मदद मिली और उनकी टमाटर, मिर्च की फसल को अतिरिक्त लाभ हुआ।

इन महिलाओं के कृषि पहल से प्रेरित होकर समूह के अन्य दीदियां भी लघु स्तर पर शाक सब्जियों की खेती कर रही है। बहरहाल इन दीदियों ने शाक सब्जियों के खेती में अपने लिए अतिरिक्त आय का जरिया को तलाश कर एक प्रगतिशील महिला कृषक का दर्जा हासिल कर लिया है।

श्री पद्धति से धान की खेती होता है दोगुना अधिक उत्पादन, ग्रीन मैन्योर ( हरी खाद) के उपयोग से होगा मिट्टी में सुधार

दंतेवाडा़@जिला प्रशासन के मार्गदर्शन में हमारे जिले के किसानों को परंपरागत धान की खेती के स्थान पर ’’श्री पद्धति’’ से बोनी के लिए प्रेरित कर उत्पादन बढ़ाने का विशेष प्रयास किया जा रहा है। इस वर्ष कृषि विभाग द्वारा जिले भर में 600 हेक्टयर में श्री पद्धति से धान की बोनी का लक्ष्य रखा गया है इसके साथ ही 1200 हेक्टेयर रकबे में हरी खाद के उपयोग कर उत्पादकता को बढ़ाने हेतु विशेष प्रयास किये जा रहे है।

कृषि विभाग से प्राप्त सूत्रों के अनुसार जिले के किसानों को ’’श्री पद्धति’’ से धान बोनी के लिए प्रोत्साहन देने के क्रम में अब तक 540 हेक्टेयर क्षेत्र में ’’श्री पद्धति’’ से धान की बोनी की जा चुकी है। और ’’श्री पद्धति’’ से खेती करने पर लगभग दो से ढाई गुना अधिक उत्पादन होगा। इसके लिए किसानों को लगातार प्रेरित किया जा रहा है। इस पद्धति से खेती के लिए जिले के विकासखंड गीदम, और दंतेवाड़ा क्षेत्र के किसानों द्वारा अधिक रूचि दिखाई जा रही है।

’’श्री पद्धति’’ से बोआई करने पर न केवल पानी की कम आवश्यकता पड़ती है साथ ही इस पद्धति से खेती करने में फसल में रोग भी लगने की संभावना भी कम रहती है। इसके अलावा ’’श्री पद्धति’’ के बोनी में उर्वरक और रासायनिक दवाओं, कीटनाशक का प्रयोग नहीं किया जाता है। इसकी जगह ’’ग्रीन मन्योर’’ (हरी खाद) का उपयोग किया गया है.

वर्तमान में बारिश की स्थिति जिले में अच्छी होने के चलते किसानों को ’’श्री पद्धति’’ से खेती के लिए अनुकूल अवसर मिला है। इस संबंध में कृषि विभाग द्वारा किसानों को खेती की तैयारी से लेकर पौधों की रोपाई की पूरी जानकारी दी जा रही है। साथ ही खरपतवार नियंत्रण के बारे में भी बताया जा रहा है। इस संबंध में जानकारी दी गई कि पिछले वर्ष तक जिले में महज एक सौ पचास हेक्टेयर में ही ’’श्री पद्धति’’ से किसान धान की खेती करते थे। जबकि इस वर्ष श्री पद्धति से धान की खेती का रकबा बढ़ाया गया है।

’’श्री पद्धति’’ बोआई के अन्य लाभ में कम बीज से अधिक उत्पादन भी शामिल है। इसके अलावा धान की खेती करने में लागत भी कम आती है। परंपरागत खेती में एक हेक्टेयर में जहां 50 से 60 किलो बीज की जरूरत पड़ती है, वहीं ’’श्री पद्धति’’ से धान की खेती में बीज जरूरत महज पांच से छह किलो की ही होती है। ऐसे में किसानों को कम बीज में अधिक उत्पादन मिलेगा। ’’श्री पद्धति’’ से उत्पादन पर भी असर पड़ता है।

किसानों को 8.53 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज वितरित,मांग का 87 प्रतिशत बीज का हो चुका है वितरण

एनबीसी इंडिया न्यूज़ रायपुर @ प्रदेश के किसानों को चालू खरीफ सीजन में विभिन्न फसलों की बोनी के लिए सरकारी समितियों एवं निजी क्षेत्र के माध्यम से सुगमता के साथ प्रमाणित बीज उपलब्ध कराए जा रहे हैं। अब तक किसानों को विभिन्न खरीफ फसलों के 8 लाख 53 हजार क्विंटल प्रमाणित बीज वितरण किए गए हैं, जो कि राज्य में बीज की मांग का 87 प्रतिशत है।

गौरतलब है कि राज्य में खरीफ की विभिन्न फसलों के प्रमाणित बीज की कुल मांग 9 लाख 78 हजार क्विंटल है, इसके विरूद्ध 9 लाख 38 हजार क्विंटल प्रमाणित बीज भण्डारण किया जा चुका है, जो कि बीज मांग का 96 प्रतिशत है। किसानों को अब तक 8.53 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज का वितरण किया गया है, जो मांग का 87 प्रतिशत है।

कांगेर वेली नेशनल पार्क मे पाया गया दुर्लभ प्रजाति का चमगादड़

राजेन्द्र बाजपेयी जगदलपुर/ बस्तर के कांगेर वैली नेशनल पार्क में पाया गया दुर्लभ प्रजाति का चमगादड़ जिसका वैज्ञानिक नाम केरिवोला पेक्टा है कांगेर वेली नेशनल पार्क में चमगादड़ की एक नई प्रजाति मिली है, जो यहां के स्टाफ के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है यह बेहद अनोखा चमगादड़ न पूरे काले रंग का न होकर नारंगी और काले रंग का है इस चमगादड़ को देखकर ऐसा लगता है जैसे किसी कलाकार ने बेहद बारीकी से अपनी कारीगरी दिखाते हुए उस पर पेंट कर दिया हो, इसका खूबसूरत रंग देखकर चमगादड़ो के विषय में फैली सभी नेगेटिव बातेँ बेमानी लगती हैं।

इन दिनों रंग बिरंगा ये चमगादड़ चर्चा में है। पक्षी विशेषज्ञों के अनुसार रंग बिरंगी प्रजाति के इस बैट को पेटेंड बैट के नाम से भी जाना जाता है, इसका वैज्ञानिक नाम “केरीवोला पिक्टा” है।

बताया जाता है कि ये ज्यादातर सूखे इलाकों या ट्री हाउस में पाए जाते हैं, इनका वजन मात्र 5 ग्राम होता है।

38 दांतों वाला यह चमगादड़ सिर्फ कीड़े मकोड़े खाता है, चमगादड़ो की यह प्रजाति भारत और चीन समेत कुछ एशियाई राज्यो में मिलती है।

भारत की बात करें तो सबसे पहले इसे साल 2019 में केरल में देखा गया था, जिसके बाद साल 2020 में इसे उड़ीसा में देखा गया, उसके बाद पहली बार इसे बस्तर के कांगेर वैली नेशनल पार्क में देखा गया है, चमगादड़ की दूसरी प्रजातियों के मुकाबले यह पेटेंड बैट बेहद खूबसूरत दिखता है. अधिकांश अन्य चमगादड़ों की तरह पेंटेड बैट भी देर शाम को निकलता है और सक्रिय रहता है क्योंकि जब अंधेरा हो जाता है तब इकोलोकेशन का उपयोग करके यह कीड़ों के लिए शिकार करता है।

नेशनल पार्क में दिखने वाले दुर्लभ प्रजाति के इस चमगादड़ का दिखना पूरे प्रदेश के लिए एक बड़ी उपलब्धि है ।

वायरल वीडियो:- फर्जी FCI अधिकारी बन धान खरीदी केंद्र में दी दबिश, शक होने पर किसानों ने खदेड़ा, सोशल मीडिया में वीडियो वायरल।

कवर्धा/ जिले के धान खरीदी केंद्र में 4 से 5 लोग फर्जी FCI अधिकारी बनकर दबिश देने पहुँचे, जहां सूत्र बतलाते है धान चेकिंग के नाम पर दबाव बना वसूली करने के फिराक में थे, लेकिन पैसे की वसूली करते इससे पहले किसानों को शक हो गया और उनसे उनकी आईकार्ड पहचान पत्र पूछें गए, लेकिन किसी ने भी अपने FCI अधिकारी होने का कोई प्रूफ़ नही से पाए, काफी देर तक बहस के बाद आक्रोशित किसानों ने उन्हें खदेड़ दिया।

वायरल वीडियो?

जिसका वीडियो सोशल मीडिया में जमकर वायरल हो रहे, वही वायरल हो रहे वीडियो कवर्धा जिले के पंडरिया कुंआमालगी का बतलाए जा रहे।