बालोद: दीवार का ‘बारिश टेस्ट, पानी आया तो दीवार बोली-साहब, अब मुझसे और नहीं सहा जाता!

घोटिया में पहली बरसात में ही रिटर्निंग वॉल ने छोड़ा साथ, ग्रामीणों का आरोप—नींव 4 फीट की होनी थी, कथित तौर पर 2 फीट में निपटा दिया काम; अब सवालों की नींव में कौन खड़ा है?

बालोद/डौंडी।
सरकारी निर्माण भी बड़ा कमाल का होता है। बनते समय फाइलों में इतना मजबूत कि मानो सौ साल तक टस से मस न हो, लेकिन बारिश आते ही पता चलता है कि असली मजबूती कागज में थी या जमीन पर!

डौंडी ब्लॉक के ग्राम पंचायत घोटिया में करीब 19 लाख रुपये की लागत से बनी रिटर्निंग वॉल का भी कुछ ऐसा ही हाल सामने आया है। पहली बारिश हुई और दीवार ने ऐसा जवाब दिया मानो उसने पहले ही कह दिया हो…

“भाई साहब, बजट तो 19 लाख का था, लेकिन मेरी सहनशक्ति इतनी नहीं थी!”

खेखड़ी नाला के किनारे मैदान की मिट्टी को कटाव से बचाने के लिए बनाई गई यह दीवार पहली बारिश में ही जगह-जगह टूट गई। अब दीवार के टूटे हिस्से को देखकर ग्रामीण सवाल कर रहे हैं कि आखिर 19 लाख रुपये की मजबूती बारिश के कितने पानी के लिए बनाई गई थी?

बारिश ने किया ‘क्वालिटी चेक’, दीवार हो गई फेल!

ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण में नाले की ही कथित तौर पर गुणवत्ताहीन रेत का इस्तेमाल किया गया। आरोप यह भी है कि निर्माण कार्य एस्टीमेट के मुताबिक नहीं किया गया।

यानी सरकारी निर्माण का शायद नया फार्मूला सामने आया है..

“सामग्री वही जो आसपास मिले, नींव जितनी आसानी से हो जाए उतनी, और गुणवत्ता की जांच बारिश के भरोसे!”

हालांकि यह आरोप हैं और इनकी पुष्टि जांच के बाद ही होगी।

लेकिन तस्वीरें देखकर सवाल जरूर खड़े होते हैं।

क्योंकि जिस दीवार को पानी रोकना था, वही पहली बारिश में पानी के सामने अपना अस्तित्व बचाने में जुटी नजर आ रही है।

चार फीट का एस्टीमेट, दो फीट की कहानी?

मामले में सबसे ज्यादा चर्चा नींव की गहराई को लेकर है।

ग्रामीणों का दावा है कि एस्टीमेट में नींव करीब चार फीट गहरी रखने का प्रावधान था, जबकि मौके पर कथित तौर पर करीब दो फीट की नींव ही दी गई।

अब सवाल यह है कि अगर चार फीट जरूरी था तो दो फीट में किसका भरोसा था?

क्या बाकी दो फीट नींव भी किसी सरकारी फाइल में सुरक्षित पड़ी है?

या फिर निर्माण की गणित ही कुछ ऐसी थी..

“चार फीट कागज पर, दो फीट जमीन पर… बाकी भगवान भरोसे!”

बहरहाल, ग्रामीणों के इन आरोपों की तकनीकी जांच जरूरी है।

पंचायत एजेंसी, ठेकेदार मैदान में और निगरानी किसके जिम्मे?

बताया जा रहा है कि इस काम के लिए ग्राम पंचायत निर्माण एजेंसी थी और काम ठेकेदार के माध्यम से कराया गया।

अब यहां सवालों की पूरी लाइन लगती है।

काम ठेकेदार ने किया तो गुणवत्ता कौन देख रहा था?

पंचायत निर्माण एजेंसी थी तो निगरानी किसकी थी?

तकनीकी जांच किस स्तर पर हुई?

माप पुस्तिका में क्या दर्ज हुआ?

और सबसे बड़ा सवाल…

अगर काम पूरी तरह एस्टीमेट के मुताबिक हुआ था, तो पहली बारिश ने उसे ‘अनुत्तीर्ण’ क्यों कर दिया?

तकनीकी सहायक देवेंद्र कुमार भूआर्य का कहना है कि काम एस्टीमेट के आधार पर किया गया है।

तो फिर मामला और दिलचस्प हो जाता है।

एक तरफ जमीन पर टूटी दीवार है और दूसरी तरफ कागजों में सही काम—अब असली सच जांच की हथौड़ी ही बताएगी कि गलती कहां हुई।

19 लाख की दीवार या 19 लाख का सवाल?

ग्रामीणों के लिए यह सिर्फ सीमेंट-पत्थर की दीवार नहीं थी। इसका उद्देश्य मैदान की मिट्टी को कटाव से बचाना था।

लेकिन पहली बारिश के बाद हालात देखकर ग्रामीणों में नाराजगी है।

उनका कहना है कि अगर निर्माण में गुणवत्ता से समझौता हुआ है तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए और भुगतान पर रोक लगाई जानी चाहिए।

अब जरा सरकारी खर्च का हिसाब समझिए…

पैसा लगा 19 लाख का,
उम्मीद थी सालों की,
बारिश आई पहली,
और सवाल खड़े हो गए दर्जनों!

यानी जनता पूछ रही है..

“दीवार कितने साल चलनी थी और कितनी बारिश में चल बसी?”

टूटे वॉल के सामने राजनीति भी गर्म

दीवार टूटी तो मामला सिर्फ तकनीकी नहीं रहा। आरोपों के साथ राजनीति भी मौके पर पहुंच गई।

भाजपा मंडल अध्यक्ष कुसुमकसा योगेंद्र गांधी ने मौके पर पहुंचकर टूटे हुए वॉल के सामने वीडियो जारी किया और निर्माण में कथित भ्रष्टाचार का आरोप लगाया।

अब तस्वीर यह है कि…

नाले में पानी है,
किनारे टूटी दीवार है,
सामने कैमरा है
और उसके ऊपर भ्रष्टाचार के आरोपों की बारिश!

अब जांच बताएगी कि मामला वास्तव में भ्रष्टाचार का है, निर्माण की तकनीकी खामी का है या किसी अन्य कारण से दीवार टूटी।

अधिकारी बोले-पहले जांच, फिर कार्रवाई

मामले में अपर कलेक्टर चंद्रकांत कौशिक ने कहा है कि पहली बारिश में रिटर्निंग वॉल टूटने के मामले में जांच प्रतिवेदन लिया जाएगा और इसके बाद टीम गठित की जाएगी। टीम की अनुशंसा के आधार पर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

अब यही जांच इस पूरे मामले की सबसे अहम कड़ी है।

क्योंकि ग्रामीणों का सवाल सीधा है..

अगर काम सही था तो दीवार क्यों टूटी?
और अगर काम गलत था तो जिम्मेदार कौन?

बारिश ने दीवार नहीं, ‘दावे’ की नींव हिला दी!

सरकारी निर्माण में अक्सर उद्घाटन के समय कहा जाता है..
“यह विकास की मजबूत नींव है।”

घोटिया में अब ग्रामीण पूछ रहे हैं..

“नींव मजबूत थी या सिर्फ उद्घाटन का भाषण?”

19 लाख रुपये की लागत वाली रिटर्निंग वॉल पहली बारिश में टूट गई है। अब देखना यह है कि प्रशासन की जांच कितनी गहराई तक जाती है।

Nbcindia24

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