सुकमा | धर्मेन्द्र सिंह
छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित सुकमा जिले की दुर्गम पहाड़ियों पर बसा गोगुंडा गांव आज ऐतिहासिक पल का गवाह बना। आजादी के 78 वर्ष बाद, करीब 650 मीटर ऊंचाई पर स्थित इस गांव में पहली बार बिजली का बल्ब जला। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में यह उपलब्धि न केवल तकनीकी सफलता है, बल्कि चार दशकों से विकास से कटे इस क्षेत्र में उम्मीद की नई किरण भी है।
अंधेरे का अंत: ढिबरी से बिजली तक
सूरज ढलते ही जो गांव कभी घने जंगलों और नक्सलियों के सन्नाटे में डूब जाता था, वहां अब बच्चों की पढ़ाई और घरों की रौनक लौट आई है। मिट्टी के तेल की ढिबरी और टॉर्च के सहारे जीवन बिताने वाले ग्रामीणों की आंखों में आज खुशी के आंसू हैं।
गांव के बुजुर्ग माड़वी सुक्का ने भावुक होकर कहा,
“हमने कभी नहीं सोचा था कि अपने जीते जी गांव में बिजली देख पाएंगे। आज लगता है कि हमारा गांव भी देश के नक्शे पर है।”
सुरक्षा और विकास का संगम
यह बदलाव अचानक नहीं आया। इसके पीछे सुरक्षाबलों और प्रशासन का संयुक्त प्रयास रहा।
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सुरक्षा कवच: Central Reserve Police Force (सीआरपीएफ) की 74वीं बटालियन और पुलिस के सहयोग से क्षेत्र में कैंप स्थापित किया गया, जिससे नक्सलियों का सुरक्षित ठिकाना ध्वस्त हुआ।
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दुर्गम राहें हुईं आसान: जहां पहले 5 घंटे पैदल पहाड़ चढ़ना पड़ता था, अब वहां विकास कार्यों की गाड़ियां पहुंच रही हैं।
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प्रशासनिक पहल: कलेक्टर अमित कुमार के नेतृत्व में स्कूल, आंगनबाड़ी और राशन दुकान जैसी मूलभूत सुविधाएं तेजी से शुरू की गईं।
कलेक्टर अमित कुमार ने कहा कि गोगुंडा में बिजली पहुंचना सामाजिक और आर्थिक बदलाव की शुरुआत है।
“हमारा लक्ष्य जिले के अंतिम छोर तक बिजली, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा पहुंचाना है। सुरक्षा और विकास एक-दूसरे के पूरक हैं।”
वहीं 74वीं बटालियन के कमांडेंट हिमांशु पांडे ने बताया कि कैंप स्थापना के बाद क्षेत्र में स्थायित्व आया है और यह रोशनी शांति और प्रगति का नया अध्याय लिखेगी।
एक नई सुबह की शुरुआत
गोगुंडा में जला यह पहला बल्ब केवल बिजली का प्रतीक नहीं, बल्कि दशकों के भय और अलगाव पर लोकतंत्र की जीत का संकेत है। बस्तर के बदलते स्वरूप की यह कहानी बताती है कि जब सुरक्षा और विकास साथ चलते हैं, तो सबसे दुर्गम पहाड़ भी रास्ता दे देते हैं।
अब गोगुंडा का अंधेरा स्थायी रूप से छंट चुका है—और वहां बस भविष्य की चमक बाकी है।

