छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में स्थित दल्लीराजहरा की लौह अयस्क खदानों ने न केवल औद्योगिक विकास की इबारत लिखी, बल्कि श्रमिक आंदोलनों और सामाजिक परिवर्तन की भी मिसाल कायम की। वर्ष 1955 में खनन कार्य की शुरुआत के साथ यह क्षेत्र देश के औद्योगिक मानचित्र पर उभरा और आज भी अपनी ऐतिहासिक पहचान बनाए हुए है।

1955: औद्योगिक युग की शुरुआत
सन् 1955 में जब भिलाई इस्पात संयंत्र (BSP) की स्थापना हुई, तब उच्च गुणवत्ता वाले लौह अयस्क की आपूर्ति के लिए दल्लीराजहरा की खदानों का विकास किया गया। 1959 में भिलाई इस्पात संयंत्र में उत्पादन शुरू हुआ और दल्लीराजहरा उसकी जीवनरेखा बन गया।
1960–1980: श्रमिक संघर्ष और सामाजिक जागरण
इन दशकों में खदानों में हजारों मजदूर कार्यरत रहे। बेहतर वेतन, सुरक्षा और अधिकारों की मांग को लेकर बड़े श्रमिक आंदोलन हुए। इस दौर में शंकर गुहा नियोगी के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ मजदूर आंदोलन ने नई दिशा पाई। दल्लीराजहरा देशभर में श्रमिक एकता और संघर्ष का प्रतीक बना।

1990–2000: तकनीकी आधुनिकीकरण
समय के साथ खनन प्रक्रिया में आधुनिक मशीनों और नई तकनीकों का उपयोग बढ़ा। जिससे उत्पादन क्षमता में वृद्धि हुई ।
2000 के बाद: नए विकल्प और बदलाव
छत्तीसगढ़ राज्य गठन (2000) के बाद औद्योगिक नीतियों में बदलाव आए। धीरे-धीरे भिलाई इस्पात संयंत्र के लिए लौह अयस्क की आपूर्ति के नए स्रोत विकसित किए गए, जिससे दल्लीराजहरा की निर्भरता कम हुई। इसके बावजूद यह क्षेत्र ऐतिहासिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बना हुआ है।
वर्तमान स्थिति
आज दल्लीराजहरा की खदानें सीमित उत्पादन के साथ संचालित हैं। क्षेत्र में वैकल्पिक रोजगार, पर्यटन और ऐतिहासिक पहचान को संजोने के प्रयास जारी हैं। स्थानीय लोगों के लिए यह सिर्फ खदान नहीं, बल्कि संघर्ष, विकास और पहचान का प्रतीक है।
✍️ निष्कर्ष
1955 से शुरू हुआ दल्लीराजहरा माइंस का सफर केवल खनन तक सीमित नहीं रहा। यह औद्योगिक प्रगति, श्रमिक अधिकारों की लड़ाई और सामाजिक परिवर्तन की कहानी भी है। बदलते समय के साथ चुनौतियाँ जरूर आईं, लेकिन दल्लीराजहरा आज भी छत्तीसगढ़ के औद्योगिक इतिहास का स्वर्णिम अध्याय बना हुआ है।

