लाल आतंक का छट रहा अंधेरा, जवानों ने बदली नागाराम की तस्वीर
धर्मेन्द्र सिंह सुकमा। कभी गोलियों की आवाज़ और बारूद की गंध से दहला रहने वाला बस्तर का सुदूर इलाका अब बदलाव की नई कहानी लिख रहा है। धुर नक्सल प्रभावित क्षेत्र नागाराम में सीआरपीएफ 74वीं वाहिनी द्वारा आयोजित क्रिकेट टूर्नामेंट ने यह संदेश दिया कि अब सुकमा हिंसा के साये से निकलकर विकास और शांति की नई पिच पर मजबूती से ‘बैटिंग’ कर रहा है।
यह वही सुकमा है, जहाँ कभी नक्सली घटनाओं के कारण शाम ढलते ही सन्नाटा पसर जाता था। बच्चे घरों में सिमट जाते थे, स्कूलों की पढ़ाई प्रभावित होती थी और युवाओं के सपने भय के साए में दब जाते थे। नक्सल हिंसा में शहीद हुए जवानों और निर्दोष ग्रामीणों की यादें आज भी लोगों के दिलों में ताज़ा हैं। ऐसे माहौल में नागाराम जैसे गांव में क्रिकेट टूर्नामेंट का आयोजन अपने आप में ऐतिहासिक पहल मानी जा रही है।
शहीदों की स्मृति में सजा खेल का मैदान
सीआरपीएफ 74वीं वाहिनी के कमांडेंट हिमांशु पांडे के निर्देशन में यह आयोजन बुरकापाल के शहीदों की स्मृति में किया गया। मैच शुरू होने से पहले जवानों और ग्रामीणों ने 24 अप्रैल 2017 को बुरकापाल में शहीद हुए 25 वीर जवानों को दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि अर्पित की।
यह आयोजन इस बात का प्रतीक बना कि जवानों की शहादत व्यर्थ नहीं गई। आज उसी बलिदान का परिणाम है कि अंदरूनी गांवों के युवा निडर होकर मैदान में उतर रहे हैं और खेल के माध्यम से नई पहचान गढ़ रहे हैं।
मैदान पर दिखा युवाओं का जोश
टूर्नामेंट में सुदूर वनांचल की चार टीमों ने हिस्सा लिया। खिलाड़ियों को सीआरपीएफ की ओर से खेल किट और जर्सी प्रदान की गई। फाइनल मुकाबला बेहद रोमांचक रहा।
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विजेता: चिंतलनार की टीम ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 10 हजार रुपये और ट्रॉफी अपने नाम की।
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उपविजेता: केरलपेंदा की टीम दूसरे स्थान पर रही, जिन्हें 5 हजार रुपये और ट्रॉफी से सम्मानित किया गया।
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बेस्ट बैट्समैन और बेस्ट बॉलर को भी विशेष पुरस्कार प्रदान किए गए।
मैदान में युवाओं का जोश और दर्शकों की तालियों की गूंज ने माहौल को उत्सव में बदल दिया।
स्थानीय युवा खिलाड़ी, नागाराम
“पहले इन रास्तों पर चलने में डर लगता था, लेकिन आज हम यहां खुलकर खेल रहे हैं। क्रिकेट ने हमें नई पहचान दी है और सपने देखने का हौसला भी।”
भय से भरोसे तक का सफर
कभी शाम ढलते ही सन्नाटे में डूब जाने वाले नागाराम और आसपास के गांवों में अब खेल के जरिये सुरक्षाबलों और ग्रामीणों के बीच भरोसे का पुल मजबूत हो रहा है। युवाओं के हाथों में बंदूक की जगह क्रिकेट का बल्ला थमाना, बस्तर के उज्ज्वल भविष्य की दिशा में बड़ा संकेत है।
हिमांशु पांडे, कमांडेंट, सीआरपीएफ 74वीं वाहिनी
कमांडेंट हिमांशु पांडे ने कहा, “अब सुकमा और बस्तर बदल रहे हैं। गांवों में शांति का माहौल है और युवा विकास की राह पर आगे बढ़ रहे हैं। हमारा प्रयास है कि खेल और सकारात्मक गतिविधियों के माध्यम से युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ा जाए।”
सुकमा के जंगलों में अब सिर्फ सुरक्षा अभियान ही नहीं, बल्कि उम्मीदों की नई सुबह भी नजर आने लगी है। क्रिकेट की ‘ठक-ठक’ ने यह साबित कर दिया है कि बदलाव संभव है—जब सुरक्षा, विश्वास और विकास साथ चलें।
